रक्षाबंधन: केवल भाई-बहन का नहीं, हर उस रिश्ते का पर्व जो सुरक्षा, विश्वास और अपनापन निभाए

रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और साथ निभाने की भावना का पर्व है. यह हर उस रिश्ते को खास बनाता है, जहां लोग एक-दूसरे की सुरक्षा, खुशियों और सम्मान की जिम्मेदारी निभाते हैं.

सावन की हरियाली जब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है, जब बादलों की रिमझिम धीरे धीरे विदा लेने का संकेत देती है और पूर्णिमा का चांद पूरे आकाश को अपनी शीतल रोशनी से भर देता है, तभी हमारे जीवन में एक ऐसा पर्व आता है जो केवल धागे का नहीं, बल्कि विश्वास, स्नेह और जिम्मेदारी का उत्सव है. यह पर्व है रक्षाबंधन. हम सभी जानते हैं कि रक्षाबंधन सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. वर्षों से हमें यही बताया जाता रहा है कि यह भाईबहन का त्योहार है. बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है. यह परंपरा अपनी जगह अत्यंत सुंदर है, लेकिन क्या रक्षाबंधन का अर्थ केवल इतना ही है? क्या रक्षा का अधिकार और दायित्व केवल भाई का है? क्या एक बहन दूसरी बहन की रक्षा नहीं कर सकती? क्या दो भाई एकदूसरे के सुखदुख में साथ नहीं खड़े हो सकते? क्या कोई मित्र, कोई रिश्तेदार या कोई ऐसा व्यक्ति, जो हर कठिन समय में हमारे साथ खड़ा हो, हमारी सुरक्षा और सम्मान का प्रहरी नहीं हो सकता?

मेरा मानना है कि रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ इन सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक है

रक्षाबंधन यह शब्द अपने आप में बहुत कुछ कह देता है. रक्षा अर्थात सुरक्षा, संरक्षण, सम्मान और साथ निभाना. बंधन अर्थात प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का वह धागा जो दो दिलों को जोड़ देता है. जब हम इन दोनों शब्दों को साथ रखते हैं, तब कहीं भी यह नहीं लिखा मिलता कि यह रिश्ता केवल भाई और बहन के बीच ही होना चाहिए. यह तो हर उस रिश्ते का उत्सव है जहाँ एकदूसरे के सम्मान, विश्वास और साथ की जिम्मेदारी निभाई जाती है.

शायद मेरे विचार कुछ लोगों को अलग लगें, लेकिन मेरी सोच की जड़ें मेरे बचपन में हैं

आज मेरी उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष है. मैं एक संयुक्त परिवार से हूं. हमारे घर में 3 लड़कियां और दो लड़के हैं.. रक्षाबंधन का दिन हमारे घर में किसी नियम या बंधन का नहीं, बल्कि प्रेम के उत्सव का दिन होता था. वहां किसी ने कभी यह नहीं कहा कि केवल बहन ही भाई को राखी बांधेगी. हमारे घर में हम सब एकदूसरे की कलाई पर राखी बांधते थे.

मेरा भाई मुझे राखी बांधता था, मैं उसे राखी बांधती थी. मेरी बहन मुझे राखी बांधती थी, मैं उसे राखी बांधती थी. उस समय शायद हमें इस परंपरा की गहराई समझ में नहीं आती थी, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो महसूस होता है कि हमारे घर ने हमें रक्षाबंधन का सबसे व्यापक अर्थ सिखाया था.

हमने कभी यह नहीं सीखा कि रक्षा करना केवल भाई का कर्तव्य है. हमने यह सीखा कि परिवार में हर व्यक्ति दूसरे का संबल होता है. कभी बहन भाई की हिम्मत बनती है, कभी भाई बहन का सहारा बनता है, तो कभी दो बहनें जीवनभर एकदूसरे की सबसे मजबूत ताकत बन जाती हैं.

समय बदला, समाज बदला, लेकिन मेरे मन में रक्षाबंधन की वही परिभाषा आज भी जीवित है

आज मैं स्वयं दो बेटों की मां हूं. मेरे दोनों बेटों की कोई बहन नहीं है. कई लोग पूछते हैं कि इनके यहां राखी कौन बांधता है? तब मैं मुस्कुराकर कहती हूं एकदूसरे को.

जब से दोनों इस दुनिया में आए हैं, तब से हर रक्षाबंधन पर वे एकदूसरे की कलाई पर राखी बांधते हैं. उनके लिए यह कभी प्रश्न नहीं रहा कि वे दोनों भाई हैं, इसलिए राखी कैसे बांध सकते हैं. उनके लिए यह केवल एक वचन है कि जीवन के हर सुखदुख में वे एकदूसरे के साथ खड़े रहेंगे.

मैंने कभी इस बात का इंतजार नहीं किया कि कोई बहन आएगी तभी रक्षाबंधन पूरा होगा. क्योंकि मेरा विश्वास है कि रिश्ते जन्म से नहीं, भावनाओं से बड़े होते हैं.

  • यदि दो भाई जीवनभर एकदूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, तो वह भी रक्षाबंधन है.
  • यदि दो बहनें एकदूसरे का आत्मविश्वास बनती हैं, तो वह भी रक्षाबंधन है.
  • यदि कोई मित्र हर कठिन परिस्थिति में आपका साथ देता है, तो वह भी रक्षाबंधन की भावना है.
  • यदि कोई बेटी अपने वृद्ध मातापिता की ढाल बनकर खड़ी रहती है, तो वह भी रक्षाबंधन का सबसे सुंदर रूप है.

हमारे समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि सुरक्षा का दायित्व केवल पुरुषों का है. लेकिन आज की दुनिया इस सोच से बहुत आगे निकल चुकी है. आज बेटियां अपने माता पिता की जिम्मेदारियां उठा रही हैं. बहनें अपने भाइयों की आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक शक्ति बन रही हैं.

कई परिवारों में बहनें ही अपने छोटे भाई बहनों का पालन पोषण करती हैं. ऐसे में क्या केवल भाई ही रक्षक कहलाएगा?

रक्षा का अर्थ केवल किसी संकट से बचाना नहीं होता. कभी किसी का आत्मविश्वास बचाना भी रक्षा है. कभी किसी के सम्मान की रक्षा करना भी रक्षा है. कभी किसी की बात बिना निर्णय किए सुन लेना भी रक्षा है. कभी किसी का हाथ पकड़कर यह कहना कि मैं तुम्हारे साथ हूं यह भी रक्षा है.

रक्षाबंधन हमें यही सिखाता है कि रिश्ते अधिकार से नहीं, उत्तरदायित्व से मजबूत होते हैं

आज के समय में जब रिश्ते अक्सर औपचारिकताओं तक सीमित हो जाते हैं, तब रक्षाबंधन हमें फिर से याद दिलाता है कि संबंध केवल खून से नहीं बनते. विश्वास, संवेदना और साथ निभाने की भावना ही उन्हें जीवंत बनाती है.

इतिहास में भी रक्षाबंधन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ यह पर्व केवल सगे भाईबहन तक सीमित नहीं रहा. कई बार यह सामाजिक विश्वास का प्रतीक बना, कई बार मित्रता का, तो कई बार मानवता का. यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यह किसी एक रिश्ते की सीमा में बंधने के बजाय हर उस संबंध को सम्मान देता है जिसमें सुरक्षा और विश्वास मौजूद हो.

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को रक्षाबंधन का अर्थ केवल एक रस्म के रूप में न सिखाएं. उन्हें यह समझाएं कि रक्षा का अर्थ किसी पर अधिकार जताना नहीं, बल्कि उसके सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा करना है. उन्हें यह भी बताएं कि जीवन में जो व्यक्ति आपके कठिन समय में आपके साथ खड़ा हो, वही आपका अपना है और वही इस धागे का सच्चा अधिकारी भी हो सकता है.

यदि किसी घर में केवल बहनें हैं, तो वे एकदूसरे को राखी बांधें. यदि केवल भाई हैं, तो वे एकदूसरे को राखी बांधें. यदि किसी का कोई सगा भाई या बहन नहीं है, तो वह उस व्यक्ति को राखी बांधे जिसने जीवन में हमेशा उसका साथ निभाया है. रिश्तों का विस्तार ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है. हम वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करते हैं, जहां पूरी दुनिया को परिवार माना गया है. फिर रक्षाबंधन को केवल एक रिश्ते तक सीमित क्यों रखा जाए? राखी का धागा बहुत साधारण होता है, लेकिन उसका संदेश असाधारण होता है. यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में सबसे बड़ी ताकत किसी की कलाई की शक्ति नहीं, बल्कि उसके दिल की सच्चाई होती है. इस वर्ष जब आप किसी की कलाई पर राखी बांधें, तो केवल एक रस्म पूरी न करें. यह संकल्प भी लें कि आप उस व्यक्ति के सम्मान, विश्वास और खुशियों की रक्षा करेंगे. और यदि कोई आपकी कलाई पर राखी बांधे, तो उसे केवल सुरक्षा का वचन न दें, बल्कि हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का भरोसा भी दें. यही रक्षाबंधन की वास्तविक आत्मा है. मेरे लिए रक्षाबंधन कभी केवल भाईबहन का त्योहार नहीं रहा. यह बहनबहन का भी पर्व है, भाईभाई का भी पर्व है और भाईबहन का भी. इससे भी बढ़कर, यह हर उस रिश्ते का पर्व है जो प्रेम, विश्वास, सम्मान और सुरक्षा के धागे से बंधा है.

आइए, इस बार रक्षाबंधन को परंपरा के साथ-साथ उसकी मूल भावना के साथ भी मनाएं. राखी को केवल एक धागा न रहने दें, बल्कि उसे ऐसा संकल्प बनाएं जो रिश्तों को बराबरी, अपनत्व और जिम्मेदारी के साथ जीवनभर जोड़कर रखे. क्योंकि अंततःरक्षाबंधन किसी रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि एक भावना का नाम है उस भावना का, जो कहती है, मैं हर परिस्थिति में तुम्हारे साथ हूं.


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लेखक के बारे में

By अंकिता प्रभाकर

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