जायका : प्याज के सदाबहार व्यंजन

तड़के या बघार में प्याज का इस्तेमाल बहुरूपिये की तरह होता है. भुने प्याज की तो दुनिया ही न्यारी है. बिरयानी हो या पुलाव इसके अभाव में उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती. गुजरे जमाने में बहुत सारे लोग प्याज को तामसिक समझ इससे परहेज करते थे, पर अब यह प्रतिबंध लगभग लुप्त हो चुका है.

हाल में यह समाचार पढ़ने को मिला कि केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो आज भी ग्वालियर नरेश के नाम से पहचाने जाते हैं, झुलसाने वाली गर्मी के मौसम में लू के प्रकोप से बचने के लिए प्याज की गांठ साथ लिये चलते है. जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि और जन सेवक की जिंदगी कभी भी फूलों की सेज नहीं होती. क्या अमीर और क्या गरीब, हर मौसम में दौड़-धूप करनी पड़ती है. प्याज की वह तासीर, जो गरीब परवर है, राजवंशी नेता को भी निरापद रखती है. परंतु यहां हम बात गुण या तासीर की नहीं, बल्कि जायके की कर रहे हैं. अत: तत्काल उसी तरफ मुड़ने की जरूरत है.

प्याज का पहला जायका तीखा होता है, जो छिलते और काटते वक्त ही आंखों से आंसू की धारा बहाने वाला होता है. यह तीखा जायका ही चटनी या थेचे में प्याज को आकर्षक बनाता है. अकेले कुचले प्याज के साथ बासी रोटी भी स्वादिष्ट बन जाती है. यदि सुलभ हो, तो लाल मिर्च, लहसुन, भुना टमाटर प्याज के जायके की संगत कर सकते हैं. जो लोग इतना तीखा जायका नहीं सह सकते, वे प्याज की कतरों को पानी में घुमाकर इस स्वाद को नरम बना लेते हैं. सलाद और रायते में ऐसे ही प्याज का प्रयोग होता है.

प्याज की अनेक प्रजातियां और किस्में होती हैं. एक प्याज गुलाबी छिलके वाला होता है, तो दूसरे की त्वचा बिल्कुल सफेद होती है. इन दोनों के जायके में तीखेपन में तो अंतर होता ही है, इनकी कुदरती मिठास में भी फर्क होता है. प्याज के संदर्भ में मीठे जायके की बात कुछ लोगों को अटपटी लग सकती है, परंतु यदि कभी किसी सामिष या निरामिष व्यंजन में प्याज की मात्रा ज्यादा हो जाये, तो वह जुबान पर सबसे पहले मिठास ही दर्ज कराता है. दिल्ली और भोपाल का इस्टु इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. प्याज की इस मिठास को काटने के लिए ही इसकी पाक विधि में नाममात्र का दही अथवा टमाटर डालना जरूरी हो जाता है. सलाद के लिए जिस कच्ची हरी प्याज का इस्तेमाल किया जाता है, उसमें यह मिठास बहुत कम होती है. उस प्याज का स्वाद उसी की हरी पत्तियों के साथ पकाये जाने पर जरूर मीठा लगने लगता है.

प्याज का जायका सिर्फ तीखा (वाष्पशील आयोडिन के कारण) सिर्फ तीखा ही नहीं होता, काफी प्रभावशाली भी होता है. कतरी प्याज के छोटे-छोटे कण ही भेलपूरी जैसे चाट के आइटमों में जान डालते हैं या प्याज के लच्छे तंदूरी टिक्कों और कबाबों के जायकों को बढ़ाते हैं. प्याज के बिना यह अधूरे ही लगते हैं. पोहा जैसी हल्की-फुल्की अल्पाहार वाली चीज में भी प्याज का जरा सा पुट इस व्यंजन को उसी का बना देता है- कांदा पोहे. गोवा में सिरके और प्याज को प्रमुखता देने वाले विंडालू को दुनियाभर में लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी है. पुर्तगाली भाषा में सिरके और प्याज के लिए जिन शब्दों का प्रयोग होता है, उनके पहले अक्षरों के संगम से ही यह नामकरण हुआ है.

विदेशों में भी प्याज के विभिन्न जायकों का इस्तेमाल अलग-अलग व्यंजनों में किया जाता है- नमकीन टाट से लेकर मीठे मामलेड, जैम तक में. अभी तड़के या बघार में प्याज का इस्तेमाल बहुरूपिये की तरह होता है. भुने प्याज की तो दुनिया ही न्यारी है. बिरयानी हो या पुलाव इसके अभाव में उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती. गुजरे जमाने में बहुत सारे लोग प्याज को तामसिक समझ इससे परहेज करते थे, पर अब यह प्रतिबंध लगभग लुप्त हो चुका है.

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