सिर्फ महिलाओं की नहीं है इंफर्टिलिटी की समस्या, पुरुषों से जुड़े कारण भी होते हैं जिम्मेदार

बढ़ती निःसंतानता की समस्या? आईवीएफ (IVF) कैसे उम्मीद की किरण है, जानें कारण, फायदे और पूरी प्रक्रिया.

वर्ल्ड आईवीएफ डे (25 जुलाई)

प्रो. (डॉ.) नीता सिंह, सीनियर गाइनिकॉलजिस्ट, एम्स दिल्ली डॉ. भारती कालरा, सीनियर गाइनिकॉलजिस्ट, करनाल

IVF Day Special: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बदलती जीवनशैली और बढ़ती उम्र में परिवार शुरू करने की योजना के कारण इंफर्टिलिटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे मामलों में आईवीएफ तकनीक उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है. गर्भनिरोधक के बिना एक साल तक नियमित सहवास के बावजूद गर्भधारण न कर पाने को वैज्ञानिक इंफर्टिलिटी मानते हैं, जिसके कई कारण हो सकते हैं. ऐसे कपल्स के लिए आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक) एक वरदान साबित हो रही है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया की लगभग 17.5 प्रतिशत आबादी किसी-न-किसी रूप में इंफर्टिलिटी से प्रभावित है. भारत में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चा न होने के लिए केवल महिला को जिम्मेदार ठहराना गलत है. लगभग आधे मामलों में पुरुष संबंधी कारण भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं.

क्यों होती है इंफर्टिलिटी

इंफर्टिलिटी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. इनमें असंतुलित खान-पान, मोटापा, धूम्रपान, शराब का सेवन, तनाव, आनुवंशिक कारण और बढ़ती उम्र प्रमुख हैं. महिलाओं में पीसीओएस (PCOS), एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड या फैलोपियन ट्यूब ब्लॉक होने जैसी समस्याएं गर्भधारण में बाधा बन सकती हैं. वहीं पुरुषों में कम स्पर्म काउंट, स्पर्म की खराब गुणवत्ता, संक्रमण या प्रजनन नलिकाओं में रुकावट इसकी वजह हो सकती है.

आईवीएफ से पहले और बाद में रखें ध्यान

आईवीएफ की सफलता के लिए स्वस्थ जीवनशैली बेहद महत्वपूर्ण है. संतुलित और पौष्टिक भोजन लें. जंक फूड, अधिक चीनी, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं. नियमित व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें. साथ ही डॉक्टर द्वारा बताई गई सभी सलाह का पालन करें.

क्या है आईवीएफ

आईवीएफ का पूरा नाम इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (In Vitro Fertilization) है. इसमें महिला के अंडाणु और पुरुष के स्पर्म को प्रयोगशाला में मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है. इसके बाद स्वस्थ भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि महिला 32-35 वर्ष की आयु तक प्राकृतिक तरीके या अन्य उपचारों से गर्भधारण नहीं कर पा रही हो, तो आईवीएफ एक प्रभावी विकल्प हो सकता है. 35 वर्ष से कम उम्र में इसकी सफलता दर अपेक्षाकृत अधिक होती है.

आईवीएफ की प्रक्रिया

आईवीएफ शुरू करने से पहले महिला के हॉर्मोन टेस्ट, फैलोपियन ट्यूब की जांच और पुरुष के सीमेन एनालिसिस किए जाते हैं. इसके बाद महिला को 10-12 दिनों तक हॉर्मोनल दवाएं और इंजेक्शन दिए जाते हैं, ताकि अधिक अंडाणु विकसित हो सकें. इसके बाद अंडाणुओं की परिपक्वता की जांच की जाती है.

क्या हैं संभावित जोखिम

आईवीएफ से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में मल्टीपल प्रेगनेंसी शामिल है. यदि एक से अधिक भ्रूण विकसित हो जाएं, तो जुड़वां या तीन बच्चों की गर्भावस्था हो सकती है. ऐसे मामलों में समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले शिशु और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है.

बातचीत : रजनी अरोड़ा


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Published by: Pushpanjali

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