‘Bollywood को prostitution का अड्डा समझ लिया...’ Sushant की मौत के बाद इंडस्ट्री पर बरसी गालियों से भड़के Tigmanshu Dhulia

फिल्ममेकर टिग्मांशु धुलिया ने बॉलीवुड की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताई है. उन्होंने 'एक्सट्रीम कैपिटलिज्म' को इंडस्ट्री में एक जैसेपन की जड़ बताया और कहा कि 2017 के बाद अच्छी फिल्में बनाना मुश्किल हो गया है. धुलिया ने 'पुष्पा' और 'KGF' जैसी फिल्मों को 'फिक्शनल बायोपिक' कहकर भी आलोचना की.

बॉलीवुड की फिल्मों और इंडस्ट्री के काम करने के तरीके को लेकर बहस कोई नई नहीं है. लेकिन Sushant Singh Rajput की मौत के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को लेकर सोशल मीडिया पर गुस्सा और भी ज्यादा बढ़ गया. नेपोटिज्म से लेकर ग्रुपिज्म तक, बॉलीवुड पर कई तरह के आरोप लगे और कई बार पूरी इंडस्ट्री को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया. अब फिल्ममेकर और अभिनेता Tigmanshu Dhulia ने इस पूरी सोच पर अपनी बेबाक राय रखी है.

हाल ही में एक कार्यक्रम में बॉलीवुड और मौजूदा फिल्म इंडस्ट्री की स्थिति पर बात करते हुए Tigmanshu Dhulia ने कहा कि उन्हें लगता है कि आज इंडस्ट्री एक मुश्किल दौर से गुजर रही है. उन्होंने extreme capitalism को फिल्मों में एक जैसेपन की बड़ी वजह बताया.

‘हमें कोई बचाने वाला नहीं है’

Tigmanshu Dhulia के मुताबिक extreme capitalism के दौर में सिर्फ फिल्में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया एक जैसी दिखाई देने लगी है. उन्होंने कहा कि हर शहर एक जैसा लगने लगा है और शहर का अपना कॅरेक्टर खत्म होता जा रहा है.

उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में राजनीतिक और दूसरे तरह के दबावों की ओर भी इशारा किया. उनका कहना था कि अलग-अलग संगठनों और राजनीतिक ताकतों की रोक-टोक के बीच निर्माता भी डरे हुए हैं.

उन्होंने बेबाक अंदाज में कहा, “हमें कोई बचाने वाला नहीं है.”

Sushant की मौत के बाद Bollywood को क्यों मिली इतनी गालियां?

बातचीत में Tigmanshu Dhulia ने Sushant Singh Rajput की मौत के बाद बॉलीवुड की बदली हुई छवि पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की. उनका कहना था कि अभिनेता की मौत के बाद पूरी फिल्म इंडस्ट्री को जिस तरह निशाने पर लिया गया, उससे वह सहमत नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि बॉलीवुड को इतनी गालियां मिल रही हैं, जैसे यह इंडस्ट्री नहीं बल्कि prostitution का अड्डा हो. हालांकि उनका साफ कहना था कि बॉलीवुड को इस तरह देखना सही नहीं है.

यानी Dhulia ने एक तरफ इंडस्ट्री की कमियों को स्वीकार किया, लेकिन दूसरी तरफ पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक ही नजर से देखने पर भी सवाल उठाया.

2017 के बाद अच्छी फिल्म बनाना भूल गए?

Tigmanshu Dhulia ने मौजूदा हिंदी सिनेमा की कहानी और कंटेंट पर भी तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि 2017 के बाद अच्छी फिल्म बनाना भूल गए.

हालांकि ऑनलाइन सामने आई उनकी बातचीत की रिपोर्ट्स में उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि आज के commercial cinema में मौलिक कहानियों के लिए जगह कम होती जा रही है. उनके मुताबिक जो लोग अलग तरह की कहानियां सुनाना चाहते हैं, उन्हें मौका नहीं मिलता, क्योंकि पहले ही यह मान लिया जाता है कि ऐसी फिल्म नहीं चलेगी.

‘हर फिल्म fictional biopic बन रही है’

Tigmanshu Dhulia ने मौजूदा commercial cinema को लेकर सबसे दिलचस्प टिप्पणी “fictional biopic” वाली की.

उन्होंने कहा कि corporate culture की वजह से एक ही तरह की फिल्में बन रही हैं और आज लगभग हर फिल्म एक fictional biopic जैसी हो गई है. उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर Pushpa, KGF और Dhurandhar का नाम लिया.

उनका कहना था कि commercial mainstream cinema में अब एक तय template बन गया है और उसी के आसपास फिल्में तैयार की जा रही हैं.

Dhurandhar को पसंद किया, फिर भी पूछ दिया- ‘क्या ये कहानी है?’

दिलचस्प बात यह है कि Tigmanshu Dhulia ने इसी दौरान Ranveer Singh स्टारर Dhurandhar का भी उदाहरण दिया. उन्होंने फिल्म की आलोचना जरूर की, लेकिन यह भी साफ किया कि उन्हें फिल्म का पहला हिस्सा पसंद आया.

उन्होंने फिल्म की presentation, music और engagement की तारीफ की. लेकिन कहानी को लेकर उनका सवाल था कि अगर किसी से Dhurandhar की कहानी पूछी जाए तो वह क्या बताएगा? उनके मुताबिक फिल्म का basic premise एक undercover आदमी का पाकिस्तान जाकर वहां havoc मचाना है. इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि “क्या ये कहानी है?”

Dhurandhar को लेकर उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब फिल्म की commercial success को लेकर भी काफी चर्चा है. लेकिन Dhulia का सवाल box office से ज्यादा storytelling को लेकर था.

‘लोग एक जैसे दिखने लगे हैं, शहर भी एक जैसे’

Tigmanshu Dhulia ने सिर्फ फिल्मों की कहानी की बात नहीं की, बल्कि इसके पीछे की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि corporate culture के कारण एक तरह का cinema हावी हो रहा है.

उनके मुताबिक आज फिल्मों में वही template बार-बार इस्तेमाल हो रहा है. इसका असर सिर्फ कहानियों पर नहीं बल्कि कलाकारों और उनकी appearance तक पर दिखाई देता है. उन्होंने कहा कि लोग भी एक जैसे दिखने लगे हैं, यहां तक कि hairstyles भी एक जैसे हो गए हैं और शहरों की अपनी पहचान भी खत्म होती जा रही है.

कहानी सुनाने वालों की कमी नहीं, मौका देने वालों की है कमी

Tigmanshu Dhulia की बातों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आज का commercial cinema जोखिम लेने से डरता है? उनका मानना है कि कहानी सुनाने वाले लोग मौजूद हैं, लेकिन उन्हें अपनी कहानी कहने का मौका नहीं मिल रहा.

फिल्ममेकर के मुताबिक जब किसी कहानी को यह सोचकर पहले ही खारिज कर दिया जाता है कि ‘ये नहीं चलेगी’, तो धीरे-धीरे एक ही तरह की फिल्मों का चलन बढ़ता जाता है. यही वजह है कि उन्हें आज के mainstream cinema में originality की कमी महसूस होती है.

Tigmanshu Dhulia की यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब बॉलीवुड एक तरफ बड़े-budget और बड़े-scale की फिल्मों की सफलता देख रहा है, वहीं दूसरी तरफ original storytelling, corporate control और creative freedom को लेकर बहस भी लगातार जारी है.

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लेखक के बारे में

By नेहा वर्मा

Neha Verma is an entertainment journalist with over 11 years of experience in Bollywood and digital journalism. She has worked with leading media brands including Aaj Tak, Navbharat Times and Dainik Jagran, reporting on celebrities, films, television and the wider entertainment industry. Known for her exclusive stories and breaking news coverage, she has worked in both Delhi and Mumbai. She currently heads the Entertainment section at Prabhat Khabar Digital.

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