The India story movie review: खाद्य मिलावट का मुद्दा अहम मगर स्क्रीनप्ले और ट्रीटमेंट अधपका

फिल्म एक ऐसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को सामने लाने का प्रयास है, जो देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. फिल्म खाद्य मिलावट जैसी समस्या के छिपे हुए खतरों को उजागर करती है लेकिन फिल्म के स्क्रीनप्ले और प्रस्तुतीकरण में खामियां रह गयी है

फिल्म -द इंडिया स्टोरी

निर्देशक - चेतन डीके

कलाकार -श्रेयस तलपड़े,काजल अग्रवाल, त्रिचा शारदा, मनीष वाधवा,अतुल तिवारी,मुरली शर्मा और अन्य

प्लेटफार्म -सिनेमाघर

रेटिंग -दो


the india story movie review :सिनेमा की आम परिभाषा एंटरटेनमेंट की रही है.उससे अगर जन सरोकार का मुद्दा जुड़ जाए तो फिर क्या कहना. ऐसा ही कुछ फिल्म द इंडिया स्टोरी दावा करती है. फिल्म एक ऐसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को सामने लाने का प्रयास है, जो देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. फिल्म खाद्य मिलावट जैसी समस्या के छिपे हुए खतरों को उजागर करती है लेकिन फिल्म के स्क्रीनप्ले और प्रस्तुतीकरण में खामियां रह गयी है. जिस वजह से यह जरुरी मुद्दे पर बनी फिल्म वह छाप नहीं छोड़ पायी. जैसी उम्मीद थी.

ये है कहानी 

फिल्म की कहानी, मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े )की है.जो एक्स आर्मी अफसर हैं. उनकी जिंदगी में तब थम जाती है, जब उनकी सात साल की बेटी परी (त्रिधा )के ब्लड कैंसर से ग्रसित होने की बात सामने आती है. बेटी की इलाज में सबकुछ झोंक देते हैं लेकिन उसे बचा नहीं पाते हैं.उन्हें समझ नहीं आता है कि उनकी इतनी छोटी बच्ची को किस तरह से कैंसर हो गया. इसी की पड़ताल में उसे खाने पीने की चीजों में पेस्टिसाइड के अत्याधिक इस्तेमाल और उससे होने वाले कैंसर का खतरनाक कनेक्शन के बारे में मालूम पड़ता है.वह पेस्टिसाइड बनाने वाली इन कंपनियों, ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करने वाले किसानों तक को कानून के कटघरे में ले आता है.इसमें योगेश का साथ वकील अर्चना पाटिल (काजल अग्रवाल )देती है. क्या योगेश और अर्चना ये क़ानूनी लड़ाई जीत पाएंगे.यही आगे की कहानी है.

फिल्म की खूबियां 

द इंडिया स्टोरी अपने शीर्षक की तरह पूरे भारत की कहानी है.यह फिल्म एक ऐसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को सामने लाने का प्रयास है, जो देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. फिल्म खाद्य मिलावट जैसी समस्या के छिपे हुए खतरों को उजागर करती है. फिल्म बताती है कि खाद्य पदार्थों में कुछ इस कदर मिलावट आ चुका है कि मां का दूध भी पेस्टीसाइड से बच नहीं पाया है. फ़िल्म का विषय बेहद सामयिक है .आज हम आए दिन ऐसी ख़बरें पढ़ते रहते हैं कि नक़ली दूध या पनीर पकड़ने की बातें सामने आती रहती हैं. फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसका विषय ही है. हिंदी फिल्मों में शायद ही अब तक इस अहम मुद्दे को उठाया गया हो

कहां रह गयी चूक 

फिल्म की खामियों की बात करें तो बात करें तो फ़िल्म का पहला भाग डाक्यूमेंट्री का एहसास करवाता है. सेकेंड हाफ में फ़िल्म कोर्टरूम ड्रामा में तब्दील हो जाती है. कोर्टरूम ड्रामा का मतलब पक्ष और विपक्ष की मजबूत दलीलें . जो फिल्म को मजबूती देती हैं लेकिन इस फिल्म में विपक्ष पक्ष इतना मजबूत नज़र नहीं आया है.मामला कोर्टरूम में एकतरफ़ा हो गया है. जो फिल्म को कमजोर करता है.फ़िल्म खाद्य मिलावट की समस्याओं को बताती तो है लेकिन इसके लिए मिडिलमैन को ही ज़िम्मेदार बता रही हैं. सिस्टम की कमज़ोरियों को उजागर नहीं करती है कि कहां चूक हो रही है. जिसने खानपान के मिलावट का साम्राज्य खड़ा कर दिया है. वैसे यह फ़िल्म मौजूदा सरकार का महिमा मंडन करना नहीं भूलती है .फ़िल्म में यह डायलॉग सुनने को मिल जाएगा कि ना खाता हूं और ना खाने दूँगा . वैसे कुछ संवाद और दृश्यों में कैंची भी सेंसर की चली है। शायद वह सरकार पर सवाल उठा रहे थे.स्क्रीनप्ले में किसानों की योगेश से नफ़रत अचानक से कैसे हमदर्दी में बदल जाती है . यह भी प्रभावी ढंग से नहीं आ पाया है. दो सीन के अंतराल में सबकुछ अच्छा हो जाता है .अर्चना के किरदार से जुड़ा ट्विस्ट भी स्क्रीनप्ले में कुछ ख़ास नहीं जोड़ पाता है .

बाल कलाकार त्रिधा शारदा करती है प्रभावित 

अभिनय की बात करें तो कलाकारों की भीड़ में बाल कलाकार त्रिधा शारदा की मासूमियत फिल्म को इमोशनल आधार देती है.वह अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं. श्रेयस तलपड़े ने अच्छा काम किया है,लेकिनउनकी नकली दाढ़ी उनके किरदार को कमजोर करती है. काजल अग्रवाल का अभिनय औसत है. मनीष वाधवा,मुरली शर्मा,अतुल तिवारी सहित बाकी के कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है.


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लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.
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