फ़िल्म – पेद्दी
निर्माता – वृद्धि सिनेमा
निर्देशक – बुची बाबू
कलाकार – राम चरण,जाह्नवी कपूर,दिव्येंदु,शिवा राजकुमार,जगतपति,उपेंद्र,रवि किशन और अन्य
प्लेटफार्म – सिनेमाघर
रेटिंग – दो
peddi movie review :रामचरण और जाह्नवी कपूर स्टारर फिल्म पेद्दी ने आज सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म कहकर प्रचारित की जा रही यह फिल्म असल में सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव के संघर्ष की कहानी है. फिल्म का कांसेप्ट सुनने में सशक्त लग सकता है लेकिन कहानी ,स्क्रीनप्ले सतही रह गया है. सारा फोकस हीरो वर्शिप की परम्परा पर रह गया है जिससे कहानी असल हीरो नहीं बन पायी है रही सही कसर अतिरंजना से भरे फिल्म के ट्रीटमेंट ने कर दिया है .जिस वजह से यह कहानी दिल को छूना तो दूर की बात है ,सिर्फ एंटरटेन भी नहीं कर पायी है.
ये है फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी 2016 के ओलम्पिक में भारत के ख़राब प्रदर्शन से शुरू होती है.जिसके बाद मैनेजमेंट का एक अधिकारी (बोमन ईरानी ) अपनी ट्रैवेल के दौरान रास्ते में एक ऐसी जगह पहुंच जाता है. जहाँ का क्रिकेटर, स्प्रिंटर हो या फिर पहलवान सभी का आदर्श पेद्दी (राम चरण )है.एक खिलाडी इन सभी खेलों के खिलाडियों का आदर्श कैसे हो सकता है. इस खिलाडी से मिलने की चाह में वह जब निकलता है तो कहानी 90 के दशक में आंध्रप्रदेश के विजयवाड़ा में पहाड़ियों के बीच रहने वाले आदिवासी समुदाय के पास पहुंच जाती है , जिन्हे लोग पहाड़ी दिहाड़ी कहते हैं. सरकार के लिए उस गांव और वहां रहने वाले लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है.जिस वजह से वहां के लोगों के साथ आसपास के गांव वाले भी जानवरों सा सलूक करते हैं. उन्हें मजदूरी आधी मिलती है. लोग उन्हें छूने से भी कतराते हैं.इसी आदिवासी समुदाय का पेद्दी है, जो क्रिकेट फिर पहलवानी और उसके बाद पैरा स्प्रिन्टिंग के खेल से अपने गांव और वहां के लोगों की जिंदगी बदलता है. यह सब कैसे होगा. इसी की यह कहानी है और खेलों का वह अधिकारी पेद्दी की इस जर्नी से क्या सीख लेगा. इसी के इर्द गिर्द कहानी बुनी गयी है.
कांसेप्ट दमदार ट्रीटमेंट बेअसर
फिल्म के ट्रेलर लांच पर निर्देशक बुच्ची बाबू ने कहा था कि पेद्दी रील नहीं बल्कि उनके गांव का एक रियल किरदार रहा है. उसी की प्रतिभा और संघर्ष को उन्होंने अपनी इस फिल्म में फिक्शन के साथ परिभाषित किया है. फिल्म का कांसेप्ट दमदार है लेकिन कहानी और ट्रीटमेंट असदार नहीं बन पाया है.फिल्म एक समुदाय के पहचान दिलाने के एक व्यक्ति के समर्पण और संघर्ष की कहानी है लेकिन जितना लम्बा यह रास्ता वहां तक पहुँचने के लिए लेती है. वह मनोरंजन तो दूर की बात है सब्र का इम्तिहान लेने लगती है.फिल्म के कई ट्रैक अनावश्यक हैं. फिल्म का रोमांटिक ट्रैक सिर्फ टाइम की बर्बादी है. इसके साथ ही साउथ में हीरो के वर्शिप की प्रथा ने फिल्म को कई मौकों पर अति नाटकीय बना दिया है.पेद्दी का कुश्ती से ट्रैक रेसिंग में बदलाव अति नाटकीय हो गया है. जिससे इमोशनली आप जुड़ नहीं पाते हैं. फिल्म के आखिर में जब पेद्दी का किरदार गोल्ड मेडल के बजाय माइक चुनता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. आपके दिल को उसके दर्द और संघर्ष की कहानी छू नहीं पाती है. फिल्म तीन घंटे लम्बी है. इसके बावजूद कई सवालों के जवाब नहीं देती है.क्या जाह्नवी के पिता इलेक्शन में जीतते हैं.विजयवाड़ा के लोगों का अचानक से पहाड़ी दिहाड़ियों के प्रति ह्रदय परिवर्तन क्यों हो जाता है. फिल्म इस बात को दिखाने से चूक गयी है.ऐसा लगता है कि फिल्म खत्म होनेवाली है इसलिए सबकुछ ठीक कर दिया जाता है. दिब्येंदु का किरदार भी भटका हुआ है. फिल्म के दूसरे पहलुओं की बात करें तो फिल्म के एक्शन सीक्वेंस और डांस स्टेप्स लार्जर देन लाइफ अंदाज में परदे पर परिभाषित किये गए हैं. सिनेमेटोग्राफी की तारीफ बनती है ए आर रहमान का संगीत लाउड रह गया है. गीतों के हिंदी डब के बोल अजीबोगरीब हैं तो फिल्म के हिंदी संवाद भोजपुरी अंदाज में कई जगह जबरदस्ती थोपे हुए लगते हैं.
रामचरण ने जीता दिल तो जाह्नवी हुई जाया
अभिनय की बात करें तो यह राम चरण की फिल्म है. उन्होंने अपने किरदार में खुद को झोंक दिया है खासकर पहलवान बनने का उनका ट्रांजिशन कमाल का है. परदे पर वह डांस और एक्शन में भी सीटीमार अंदाज में परफॉर्म कर गए हैं. जाह्नवी कपूर के लिए फिल्म की कहानी में करने को कुछ नहीं था. फिल्म में उन्हें ओब्जेक्टिफाय किया है.कैमरा एंगल में उनके चेहरे के एक्सप्रेशन पर कम बॉडी पर ज्यादा फोकस किया गया है. यह बात अखरती है.उन्हें इस तरह की भूमिकाओं से बचना चाहिए. फिल्म के सीन में रामचरण का किरदार जाह्नवी के किरदार को जबरदस्ती किस करता है और वह अपने बचाव में कहता है कि उसके कम्युनिटी में प्यार को जताने का यही तरीका है. यह संवाद सुनकर सिर पीटने को मजबूर करता है. रवि किशन , उपेंद्र लिमये ,बोमन ईरानी को भी फिल्म में करने के लिए कुछ खास नहीं था.दिव्येंदु मुन्ना त्रिपाठी के अंदाज में ही नजर आये हैं.शिवा राजकुमार और जगत्पति राजू अपनी अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं.
