Pati Patni Aur Woh Do Review :लाउड कॉमेडी और कहानी में लॉजिक की कमी ने फिल्म को बनाया बोझिल

आयुष्मान खुराना, वामिका, सारा और रकुल स्टारर पति पत्नी और वो दो देखने की प्लानिंग है तो इससे पहले पढ़ ले यह रिव्यु

फिल्म – पति पत्नी और वो दो
निर्माता – टी सीरीज
निर्देशक – मुद्दस्सर अजीज
कलाकार – आयुष्मान खुराना, वामिका गब्बी, सारा अली खान,रकुलप्रीत,विजय राज ,तिग्मांशु धुलिया, आयशा रजा और अन्य
प्लेटफार्म -सिनेमाघर
रेटिंग -दो

pati patni aur woh do review :हिंदी सिनेमा में रीमेक के पुराने ट्रेंड को स्प्रिच्युल रीमेक के नए टर्म ने रिप्लेस कर दिया है. जिसमें फिल्म का विषय और शैली सुपरहिट फिल्म से प्रेरित होती है,लेकिन कहानी और किरदार बिलकुल नए होते हैं.ऐसी फिल्मों का चलन इनदिनों तेजी बढ़ा है. आज रिलीज हुई पति पत्नी और वो दो इसी ट्रेंड का हिस्सा हैं. यह फिल्म 2019 में कार्तिक आर्यन स्टारर सुपरहिट फिल्म पति पत्नी और वो की स्प्रिचुयल रीमेक है हालाँकि कार्तिक की फिल्म खुद भी 1978 में रिलीज संजीव कुमार की क्लासिक कॉमेडी फिल्म पति पत्नी और वो की रीमेक थी.मतलब साफ़ है कि आज रिलीज हुई पति पत्नी और वो दो इन दो फिल्मों से प्रेरित है लेकिन इतनी ज्यादा प्रेरणा काम नहीं आयी है क्योंकि कॉमेडी ऑफ़ एरर्स के नाम पर लॉजिक से परे कहानी और लाउड कॉमेडी ही यह फिल्म परदे पर क्रिएट कर पायी है.

ये है कहानी

फिल्म की कहानी प्रजापति पांडे (आयुष्मान खुराना )की है. जो प्रयागराज में फारेस्ट ऑफिसर है. उसकी पत्नी अपर्णा (वामिका गब्बी )रिपोर्टर हैं. अपर्णा की ख़ास सहेली नीलोफर (रकुलप्रीत )है , जो प्रजापति के साथ वन विभाग में ही काम करती है.कहानी में सबकुछ ठीक चल रहा होता है लेकिन तभी कहानी में प्रजापति पांडे की कॉलेज की दोस्त चंचल (सारा अली खान )की एंट्री हो जाती है. चंचल की मदद के लिए प्रजापति को उसका प्रेमी बनना पड़ता है. इस एक झूठ से शक,कन्फ्यूजन का सिलसिला ऐसा शुरू हो जाता कि कहानी पति पत्नी और वो वाली सिचुएशन शुरू हो जाती है.अपर्णा को लगता है कि नीलोफर के साथ प्रजापति का अफेयर है और नीलोफर को लगता है कि प्रजापति का चंचल के साथ अफेयर है. क्या होगा इस कन्फ्यूजन का अंत.जिसमें बाद में जंगल के जानवर भी शामिल हो गए हैं. आगे की कहानी यही है.

फिल्म की खूबियां और खामियां

फिल्म की खूबियों की बात करें तो यह एक साफ़ सुथरी कॉमेडी फिल्म है.बस यही इस फिल्म की एकमात्र खासियत है.वरना फिल्म की कहानी एकदम घिसी पिटी सी है. 80 के दशक के पुराने फॉर्मूले पर फिल्म बनी है.रकुल का किरदार जरूरत से ज्यादा इंटरफेरिंग क्यों है. यह बात समझ ही नहीं आती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा ठीक है लेकिन सेकेंड हाफ में फिल्म बोझिल बन गयी है.रही सही कसर जबरदस्ती खींचा हुआ क्लाइमेक्स पूरा कर देता है.दो घंटे की यह फिल्म किरदारों को गहराई नहीं दे पायी है, जिससे फिल्म का थोड़ा बहुत इमोशन भी आपसे कनेक्ट नहीं होता है. उम्मीद थी कि कॉमेडी में नयापन होगा लेकिन कुछ एक वन लाइनर्स को छोड़ दें तो कफ्यूजन वाली ये कॉमेडी बहुत जगहों पर थोपी हुई और लाउड हो गयी है.कॉमेडी के साथ साथ बैकग्राउंड म्यूजिक भी लाउड रह गया है. गीत संगीत की बात करें तो कुछ गाने अच्छे हैं लेकिन वह मिस फिट हैं. फिल्म में गाने कहीं से भी शुरू हो जाते हैं. सिनेमेटोग्राफी औसत है.फिल्म के माहौल को पूरा देसी रखा गया है. छोटे शहर की बोली को इसमें पिरोया गया है. जो कहीं कहीं पर कैरीकेचर सा भी बन गया है.बाकी के पहलू ठीक ठाक हैं

कमजोर लेखन ने कलाकारों को भी किया कमजोर

अभिनय की बात करें तो अभिनेता आयुष्मान खुराना अपने चित परिचित अंदाज में नजर आये हैं.वह परदे पर कुछ खास क्रिएट नहीं कर पाए हैं. जिसके लिए वह जाने जाते हैं.सारा अली खान ने ओवर द टॉप वाली एक्टिंग की है. सारा के मुकाबले रकुल ठीक रही हैं. वामिका का अभिनय जरूर थोड़ी राहत देता है.दुर्गेश कुमार, तिग्मांशु धुलिया ,विजय राज और आयशा रजा सहित बाकी के किरदारों ने अपनी -अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है


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लेखक के बारे में

Published by: Urmila Kori

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