फिल्म - गांधारी
निर्माता - कथा पिक्चर्स
निर्देशक - देवाशीष मखीजा
कलाकार - तापसी पन्नू,छाया क़दम,मीता वशिष्ठ,इश्वाक सिंह, प्रशांत नारायण,स्वस्तिका मुखर्जी, चन्दन रॉय और अन्य
प्लेटफार्म - नेटफ्लिक्स
रेटिंग -दो
gandhari movie review :हिंदी सिनेमा में कलाकार और लेखक की गिनी चुनी जोड़ियां रही हैं. इसी चुनिंदा फेहरिस्त में अभिनेत्री तापसी पन्नू और लेखिका कनिका ढिल्लों का नाम आता है .जो अब तक छह फ़िल्मों में साथ काम कर चुकी हैं मनमर्जियाँ से शुरू हुआ यह सिलसिला रश्मि रॉकेट,हसीन दिलरुबा ,डंकी,फिर आई हसीन दिलरुबा से होता हुआ आज रिलीज हुई फ़िल्म गांधारी तक जा पहुंचा है. इस जोड़ी ने लगातार ऐसी कहानियां दी.जो अलग अलग जॉनर की थी लेकिन महिला किरदार हमेशा सशक्त था .इस बार इस मेल ने गांधारी के जरिये पर्दे पर क्या कुछ खास रचा है या फिर यह जोड़ी चूक गयी है. इसको जानने के लिए पढ़ें यह रिव्यू
ये है कहानी
फ़िल्म की कहानी की बात करें तो यह पक्षिम बंगाल के काल्पनिक गांव जॉयपुरा में स्थित है. कहानी एक ट्रेन जर्नी से शुरू होती है. बानी (तापसी पन्नू )अपनी पांच साल की बेटी मिष्टी और पति गोकुल (इश्वाक सिंह )के साथ सफर कर रही है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि मिष्टी, बानी के सामने से अगवा हो जाती है.उसे बचाने के लिए उसके पीछे भागते हुए उसे आँखों में चोट लग जाती है और उसकी आँखों की रौशनी भी चली जाती है लेकिन वह अपनी बेटी की तलाश नहीं छोड़ती है.इस दौरान उसे मालूम पड़ता है कि जॉयपुरा में सिर्फ उसकी बेटी गायब नहीं हुई है बल्कि वहां बच्चों की ट्रैफिकिंग का बड़ा नेटवर्क है. जिसमें जॉयपुरा की पुलिस ही नहीं बल्कि स्थानीय लोग भी मिले हुए हैं. क्या बानी अपनी बेटी मिष्टी को बचा पाएगी. यही आगे की कहानी है.
लेखन ने इस थ्रिलर फिल्म को किया कमजोर
फिल्म की कहानी की चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकिंग पर है. यह मुद्दा अहम है लेकिन इस पर अब तक कई फिल्में और सीरीज बन चुकी हैं. इस फिल्म में कुछ अलग करने की कोशिश नहीं हुई है. खास बात है कि फिल्म में और भी मुद्दे डाल दिए गए हैं. मायथोलॉजी , रिवेंज, अतीत,बहरूपिया गैंग, ऑर्गनाइज्ड क्राइम सहित और भी कई मुद्दे लेकिन फिल्म किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पाती है. स्क्रीनप्ले से लॉजिक भी गायब है.बच्चियों की तस्करी में पूरा जॉयपुरा मिला हुआ है. वहां की बच्चियां ही गायब हो रही हैं.फिर भी स्थानीय लोगों को कुछ पता नहीं है. बच्चियां हमेशा बेहोश ही रहती हैं. आराम से बोरी में भरकर उन्हें भेजा जा रहा है जबकि पूरे जॉयपुरा में नाकाबंदी है. यहाँ भी लॉजिक गायब है बच्चियां इतनी देर तक कैसे बेहोश हो सकती हैं.स्वस्तिका मुखर्जी के एनजीओ में लायी हुई बच्चियां अचनाक से कहाँ गायब हो गयी थी.जब पुलिस रेड मारने आयी थी. स्क्रीनप्ले में वह बताने की जरूरत नहीं समझी गयी है. यह एक थ्रिलर फिल्म है लेकिन इसके ट्विस्ट बेहद कमजोर हैं, जो रोमांच के बजाय उलझन को बढ़ाते हैं.रही सही कसर कमजोर क्लाइमेक्स पूरी कर देता है. कनिका और निर्देशक देवाशीष मखीजा का नाम रिअलिस्टिक सिनेमा से जुड़ा हुआ है. लेकिन इस फिल्म में यह दोनों नाम निराश करते हैं. फिल्म रिअलिस्टिक जॉनर में कुछ नया नहीं जोड़ पायी है.फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ठीक है. गीत संगीत कहानी के साथ न्याय करते हैं.
गांधारी शीर्षक के साथ न्याय नहीं हुआ
फिल्म की घोषणा के साथ ही यह फिल्म सुर्ख़ियों में आ गयी थी क्योंकि मायथोलॉजी महाभारत के चर्चित पात्र गांधारी पर इस फिल्म का शीर्षक था.उम्मीद थी कि कनिका और तापसी की जोड़ी गांधारी के सशक्त किरदार को मौजूदा परिपेक्ष्य में प्रस्तुत करेंगी लेकिन सिर्फ आँखों में पट्टी बाँध लेने से फिल्म का शीर्षक गांधारी कर देना यह बात अखरती है.फिल्म में एक संवाद के जरिये गांधारी शीर्षक को जस्टिफाय करने की एक कमजोर कोशिश भी हुई है.
तापसी का किरदार सशक्त दूसरे किरदार कमजोर !
कनिका ढिल्लों और तापसी पन्नू का क्रिएटिव कोलाब्रेशन सभी को पता है. कनिका अपने इंटरव्यूज में इस बात का कई बार खुलासा कर चुकी हैं कि तापसी उन्हें हमेशा उनके लिए चुनौतीपूर्ण किरदार लिखने को कहती हैं.इस फिल्म में भी उन्होंने तापसी का किरदार सशक्त लिखा है. पूरी फिल्म उनके इर्द गिर्द ही है,लेकिन दिक्कत ये हो गयी है कि उन्होंने दूसरे किरदार को कमजोर कर दिया है. छाया कदम जैसी समर्थ अभिनेत्री पूरी तरह से वेस्ट की गयी है. प्रशांत नारायण का किरदार खलनायक का है. पूरी फिल्म में उनकी आंखों और आवाज से उनके किरदार को बिल्डअप किया गया है लेकिन आखिर के बीस में जब वह नज़र आते हैं तो किरदार उस तरह प्रभावी नहीं बन पाया है. जैसी उम्मीद बंधी थी. इश्वाक का किरदार ब्लैकहोल का सदस्य रह चुका है लेकिन जिस तरह से पूरी फिल्म में उसका इन्वेस्टीगेशन रहता है. वह किसी आम आदमी की तरह है.फिल्म क्लाइमेक्स में ही सही उसके किरदार को मजबूत दिखाया जा सकता था.जतिन सरना का किरदार रफ़ एंड तफ पुलिस ऑफिसर का था, लेकिन फिल्म के क्लाइमेक्स में वह अचानक से देवी के विसर्जन को छोड़कर पुलिस स्टेशन क्यों चले जाते हैं , जबकि यह बात तय हो चुकी थी कि देवी के विसर्जन के वक़्त ही बच्चियों को जॉयपुरा से बाहर भेजा जाएगा. तापसी के किरदार को देवी बनाना था शायद इसलिए उस किरदार को वहां से हटा दिया गया.
तापसी एक्शन में अव्वल इमोशन में कमजोर
अभिनय की बात करें तो यह तापसी की फिल्म है.बेबी और नाम शबाना के बाद वह एक बार फिर एक्शन अवतार में नज़र आयी हैं. उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ एक्शन सीन में परफॉर्म है लेकिन इस बार वह मां भी हैं.एक माँ के दर्द, बैचेनी और छटपटाहट को उन्होंने जीने की बहुत कोशिश की है लेकिन वह उसमें उन्नीस रह गयी हैं .छाया कदम अपनी भूमिका के साथ न्याय करती हैं लेकिन फिल्म की कहानी और उनका किरदार उनके साथ न्याय नहीं कर पाया है.इश्वाक सिंह अच्छे रहे हैं लेकिन उनका बांग्ला शब्द थोपा हुआ लगता है.मीता वशिष्ठ ,चन्दन प्रशांत नारायण, वशिष्ठ ,जतिन सरना और स्वस्तिका मुखर्जी अपनी -अपनी भूमिकाओं में जमें हैं
