फ़िल्म - दायरा
निर्माता - जंगली पिक्चर्स
निर्देशक - मेघना गुलज़ार
कलाकार - करीना कपूर ख़ान,पृथ्वीराज सुकुमारन,प्रगति मिश्रा
प्लेटफार्म- सिनेमाघर
रेटिंग - ढाई
daayra movie review :निर्देशिका मेघना गुलज़ार की 2015 में रिलीज हुई फ़िल्म तलवार ने भारतीय सिनेमा में क्राइम थ्रिलर को प्रस्तुत करने का एक नया मापदंड स्थापित किया था .यही वजह थी कि आज रिलीज हुई फ़िल्म 'दायरा' से क्राइम थ्रिलर जॉनर में उन्होंने वापसी की तो उनसे उम्मीदें बढ़ गई थी.क्या एक बार फिर वह एक शानदार और झकझोर देने वाली कहानी को पर्दे पर परिभाषित करने में कामयाब रही हैं या फिर उम्मीदें बड़ी और नतीजा बेअसर वाला मामला है . जानने के लिए पढ़े पूरा रिव्यू
ये है कहानी
फ़िल्म की घोषणा के बाद से ही निर्देशिका मेघना गुलज़ार दायरा की कहानी को 2019 में तेलंगाना के गैंगरेप ,हत्या और उसके बाद पुलिस द्वारा चारो आरोपियों के एनकाउंटर की घटना पर आधारित होने से इनकार करती आई है लेकिन फ़िल्म की कहानी मूल रूप से उसी घटना से प्रेरित है. ट्रक ड्राइवर के एंगल से लेकर क्राइम रिक्रिएट करवाने का एक्सक्यूज़ सब एक जैसा है. उस घटना के बाद पुलिस की क्या कार्यवाही रही थी. फिर पुलिस की टीम ने अपराधियों को कैसे पकड़ा था . यह सिर्फ उसकी कहानी भर नहीं है बल्कि यह कहानी पुलिस महकमे में काम कर रहे डीएसपी रमन कुमार ( पृथ्वीराज)और एसआईटी प्रमुख अंजुनी कोहली ( करीना कपूर ख़ान ) की कहानी है .न्याय को लेकर जिनकी सोच बिल्कुल अलग- अलग है .जब इनकी दुनिया आपस में इस केस की वजह से टकराती है तो क्या होता है . क्या न्याय का इंतज़ार करना चाहिए या न्याय के लिए क़ानून को अपने हाथ में लेना जायज़ है .यही कहानी है .
स्क्रीनप्ले गंभीर सवाल उठाती है लेकिन जवाब अधूरा देती है
दायरा का जब ट्रेलर आया था तो उम्मीद थी कि मेघना गुलजार की यह फ़िल्म गहरे में उतरेगी . यह फ़िल्म क़ानून और इंसाफ़ बीच के फ़र्क़ को बताएगी . यह फ़िल्म ड्यूटी और इमोशन के बीच के दायरे को समझाएगी लेकिन फ़िल्म की कहानी में नयेपन की कमी है . मसाला फ़िल्मों से लेकर समानांतर सिनेमा तक में यह कहानी कई बार देखी जा चुकी है .जब पुलिस वाला इंसाफ़ के लिए कोर्ट का इंतज़ार नहीं करता है बल्कि क़ानून अपने हाथ में ले लेता है.निश्चिततौर पर फ़िल्म का ट्रीटमेंट बहुत ही सीरियस और रीयलिस्टिक अंदाज़ में किया गया है .इससे इनकार नहीं है,लेकिन फ़िल्म उस सवाल का जवाब नहीं दे पाती है बल्कि कन्फ़्यूज़ करती है .फ़िल्म जुवेनाइल के मुद्दे को जिस तरह से निर्भया केस से जोड़कर दिखाती है. वह भी फ़िल्म के कन्फ़्यूज्न को बढ़ाता है .फ़िल्म में अजूनी और रमन के किरदार के बीच फेस ऑफ के एक दो और सीक्वेंस होने चाहिए थे .स्क्रीनप्ले में पृथ्वीराज और करीना के किरदार की पर्सनल लाइफ पर भी थोड़ा फोकस होना चाहिए था खासकर पृथ्वीराज के किरदार के. सिर्फ एंगर इशू के बारे में कुछ शब्दों मैं जानकारी दी गयी है.फ़िल्म के अच्छे पहलुओं में इसका प्रोडक्शन और सिनेमेटोग्राफी है . जो बेहद रीयलिस्टिक हैं . लोकेशन और कपड़ों से लेकर सबकुछ. जो इस फ़िल्म को मजबूती देता है .फ़िल्म में एक ही गीत है ,जो कहानी के विषय के साथ न्याय करता है . बाक़ी पहलू ठीक ठाक हैं
करीना औसत पृथ्वीराज अव्वल
अभिनय की बात करें तो यह फ़िल्म पृथ्वीराज सुकुमारन की है . पुलिसवाले की भूमिका में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है .उनका बॉडी लैंग्वेज हो या चेहरे के एक्सप्रेशन वह अपने किरदार को मजबूत बना गए हैं .करीना कपूर औसत हैं .फ़िल्म में वह एक कूल पुलिस ऑफिसर के तौर पर दिखती हैं . जो मेकअप करती है .दिक्कत मेकअप से नहीं बल्कि जिस तरह से वह मुस्कुराते हुए सभी से बात करती हैं . वह फ़िल्म देखते हुए अखरता है फ़िल्म का विषय और ट्रीटमेंट के अनुरूप उनके किरदार में बैचेनी और छटपटाहट की ज़रूरत थी . क्षिति जॉग सीमित स्क्रीन स्पेस में भी अपने किरदार से जुड़े दर्द को बखूबी जीती हैं . जितेंद्र जोशी भी अच्छा काम कर गए हैं . बाक़ी के किरदारों ने भी अपनी - अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है .
