इस हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई 'द इंडिया स्टोरी' सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, बल्कि ऐसी फिल्म है जो हर परिवार से जुड़ा एक बड़ा सवाल उठाती है. हम रोज जो फल, सब्जियां और खाना खाते हैं, क्या वह सच में सुरक्षित है? फिल्म इसी सवाल के जवाब की तलाश करती है. निर्देशक चेतन डीके ने इस गंभीर विषय को एक पिता की दर्द भरी कहानी के साथ जोड़ा है, जिससे फिल्म सिर्फ जानकारी नहीं देती बल्कि दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ लेती है. अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो मनोरंजन के साथ कोई जरूरी संदेश भी देती हैं, तो यह फिल्म आपको जरूर पसंद आएगी.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) से शुरू होती है, जिसकी सात साल की बेटी कैंसर की वजह से दुनिया छोड़ चुकी है. डॉक्टरों की रिपोर्ट में सामने आता है कि लंबे समय तक पेस्टिसाइड और जहरीले केमिकल वाले खाने का असर उसकी सेहत पर पड़ा. अपनी बेटी को खोने के बाद योगेश टूट जरूर जाता है, लेकिन हार नहीं मानता. वह तय करता है कि सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए लड़ेगा जो ऐसे ही खतरे का सामना कर रहे हैं.
योगेश कोर्ट पहुंचता है और सरकार, जहरीले पेस्टिसाइड बनाने वाली कंपनियों और पूरे सिस्टम के खिलाफ केस करता है. इस लड़ाई में उसका साथ देती हैं तेज-तर्रार वकील अर्चना, जिनका किरदार काजल अग्रवाल ने निभाया है. अदालत में एक-एक करके कई ऐसे खुलासे होते हैं जो दर्शकों को हैरान कर देते हैं. फिल्म दिखाती है कि कैसे ज्यादा मुनाफे के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल धीरे-धीरे हमारी थाली तक पहुंचते हैं और फिर हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं. पहले हाफ में कोर्टरूम की बहस और बड़े खुलासे कहानी को बेहद दिलचस्प बनाए रखते हैं. इंटरवल से पहले आने वाला ट्विस्ट फिल्म को और मजबूत बना देता है. दूसरे हिस्से में कहानी थोड़ी धीमी जरूर होती है, लेकिन आखिर तक यही जानने की उत्सुकता बनी रहती है कि क्या योगेश को अपनी बेटी के लिए इंसाफ मिलेगा और क्या इस पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी तय हो पाएगी.
निर्देशन कैसा है?
निर्देशक चेतन डीके ने एक ऐसे विषय पर फिल्म बनाई है, जिस पर कम ही फिल्में देखने को मिलती हैं. उन्होंने कहानी को बहुत आसान तरीके से पेश किया है, ताकि हर उम्र का दर्शक इसे समझ सके. फिल्म में कोर्टरूम ड्रामा है, इमोशन है और समाज के लिए जरूरी संदेश भी है. सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म कहीं भी भाषण देती हुई नहीं लगती, बल्कि कहानी के जरिए अपनी बात समझाती है. पिता और बेटी का रिश्ता फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी बनकर सामने आता है, जो कई जगह दर्शकों को भावुक भी कर देता है.
कलाकारों ने कैसा काम किया है?
श्रेयस तलपड़े ने एक ऐसे पिता का किरदार निभाया है जिसने अपनी बेटी को खो दिया है और अब इंसाफ के लिए हर लड़ाई लड़ने को तैयार है. उनके चेहरे के भाव और दर्द फिल्म को और असरदार बना देते हैं. काजल अग्रवाल एक आत्मविश्वासी वकील के रोल में शानदार लगी हैं. कोर्टरूम के सीन में उनकी संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस काफी मजबूत है. मुरली शर्मा और मनीष वाधवा ने भी अपने अनुभव से कहानी को मजबूती दी है. छोटी बच्ची के रोल में त्रिशा सारदा बहुत स्वाभाविक लगी हैं और उनके भावुक दृश्य लंबे समय तक याद रहते हैं. बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है.
फिल्म क्यों देखनी चाहिए?
अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो सिर्फ हंसाने या टाइमपास करने के लिए नहीं, बल्कि किसी जरूरी मुद्दे पर सोचने के लिए भी मजबूर करें, तो 'द इंडिया स्टोरी' आपके लिए अच्छी फिल्म साबित हो सकती है. यह फिल्म बताती है कि खाने की सुरक्षा सिर्फ सरकार या कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर इंसान को भी जागरूक होना जरूरी है. फिल्म मनोरंजन के साथ एक ऐसा संदेश देती है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके दिमाग में रहता है.
फाइनल वर्डिक्ट
'द इंडिया स्टोरी' एक मजबूत कोर्टरूम ड्रामा है, जो एक पिता की भावनात्मक कहानी के जरिए खाद्य सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दे को सामने लाती है. श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल की दमदार एक्टिंग, भावुक कहानी और सामाजिक संदेश इस फिल्म को खास बनाते हैं. अगर आप ऐसी फिल्में देखना पसंद करते हैं जो दिल को छूने के साथ-साथ किसी जरूरी मुद्दे पर सोचने के लिए मजबूर करें, तो 'द इंडिया स्टोरी' इस वीकेंड जरूर देख सकते हैं.
रेटिंग: 3.5/5
