II उर्मिला कोरी II
फ़िल्म: शिकारा
निर्देशक: विधु विनोद चोपड़ा
कलाकार: आदिल खान, सादिया, प्रियांशु चटर्जी और अन्य
रेटिंग: ढाई
90 के दशक में चार लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर रिफ्यूजी की ज़िंदगी जीने पर मजबूर हो गए थे. तीन दशक बाद विदु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म शिकारा से कश्मीरी पंडितों के उसी दर्द को बयां करने की कोशिश की गयी है. 30 साल बाद भी वह अपने घरों और जन्मभूमि से दूर हैं.
फ़िल्म में इस दर्द को शिव और शांति की प्रेमकहानी के ज़रिए अभिव्यक्त किया गया है जो दिल को छूती है लेकिन कश्मीरी पंडितों के निष्कासन की पीड़ा को मुखर अभिव्यक्ति देने से यह फ़िल्म चूक जाती है.
फ़िल्म कश्मीर के एक प्यारे जोड़े शिव धर (आदिल खान) और शान्ति (सादिया) की कहानी है जो अपने घर शिकारा में बहुत खुश हैं. घाटी में साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती है और शिव और शांति को रातों रात लाखों कश्मीरी पंडितों के साथ अपना घर छोड़कर जाना पड़ता है. उन्हें यकीन है कि एक दिन वो अपने घर वापस लौटेंगे और कश्मीर के पानी में ही उनकी राख बहायी जाएगी. फ़िल्म में इनदोनों किरदारों के माध्यम से कश्मीरी पंडितों के दर्द को फ़िल्म में बयां किया गया है.
फ़िल्म की कहानी मूल रूप से प्रेमकहानी है. आतंकवाद, अमेरिका कश्मीर में आतंकवाद की मुख्य वजह और कश्मीरी पंडितों की त्रासदी को सिर्फ संदर्भ के तौर पर लिया गया है. कश्मीर में आतंक किस तरह से बढ़ा. सरकार कहां कमज़ोर रह गयी. विपक्ष में बैठे लोगों ने क्यों नहीं कुछ किया. इन सब सवालों को फ़िल्म में दिखाया ही नहीं गया है.
फ़िल्म में एक संवाद है इतने सारे पंडितों को बेघर कर दिया गया है. अब आप देखें कि दिल्ली में क्या होता है. संसद में हंगामा मच जाएगा. लोग धरने पर बैठ जाएंगे. हफ्ते दस दिन की बात है. इतना हंगामा मचेगा कि सब ठीक हो जाएगा.
ऐसा क्यों नहीं हुआ था? रातों रात लाखों कश्मीरी पंडितों को बेघर कर दिया गया. 30 साल तक वह अपने ही देश में रिफ्यूजी का जीवन क्यों जी रहे हैं. यह मुद्दा क्यों नहीं संसद से सड़क तक उछला. ये सवाल फ़िल्म देखते हुए अधूरे रह जाते हैं जो इस फ़िल्म एक बेहतरीन फ़िल्म बनने से रोक देते हैं. फ़िल्म उन लोगों को भी संदेश देने से नहीं कतराती है, जो सांप्रदायिक तर्ज पर समाज को विभाजित करते हैं. राम मंदिर के संदर्भ वाले दृश्य में बात बखूबी आती है.
अभिनय की बात करें तो आदिल और सादिया की यह पहली फ़िल्म है लेकिन उन्होंने अपने प्रभावी अभिनय से विस्थापन की त्रासदी और 30 सालों के सफर को बखूबी जिया है. प्रियांशु चटर्जी की भूमिका छोटी है लेकिन वो याद रह जाते हैं. बाकी के कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है. फ़िल्म के दूसरे पहलुओं की बात करें तो फ़िल्म की सिनेमाटोग्राफी कमाल की है. 90 के दशक से 2018 तक उन्होंने कश्मीर को बखूबी अपने कैमरे में जीवंत किया.
फ़िल्म का गीत संगीत कहानी के अनुरूप है. वादी शहज़ादी सबसे खूबसूरत बन पड़ा है जो दिल को छू आंखों को नम कर जाता है. फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी असरकारक है. कुलमिलाकर यह फ़िल्म प्रेमकहानी के तौर पर दिल को छूती है.
