सत्यजीत रे : वह फिल्मकार जिसके फिल्मों को देख निर्देशक सीखते हैं फिल्म बनाना

अपनी पहली फिल्म ‘पाथेर पंचाली’ से दुनिया को स्तब्ध करने वाले सत्यजीत रे का आज जन्मदिन है. फिल्मकार बनने से पहले सत्यजीत रे एक एड कंपनी ‘जूनियर विजुलाइजर’ में काम किया करते थे. यहां उन्होंने ग्राफिक डिजाइन का काम सीखा, लेकिन कंपनी में भारतीय और ब्रिटिश कर्मचारियों के बीच गहरे मतभेद थे. इस दौरान उन्होंने […]

अपनी पहली फिल्म ‘पाथेर पंचाली’ से दुनिया को स्तब्ध करने वाले सत्यजीत रे का आज जन्मदिन है. फिल्मकार बनने से पहले सत्यजीत रे एक एड कंपनी ‘जूनियर विजुलाइजर’ में काम किया करते थे. यहां उन्होंने ग्राफिक डिजाइन का काम सीखा, लेकिन कंपनी में भारतीय और ब्रिटिश कर्मचारियों के बीच गहरे मतभेद थे. इस दौरान उन्होंने नौकरी बदलकर सिगनेट प्रेस में काम शुरू किया. यह एक पब्लिशिंग एजेंसी थी.

इस दौरान उन्होंने कई किताबों का कवर डिजाइन किया. इन्हीं में से एक थी – विभूति भूषण उपाध्याय की किताब ‘पाथेर पंचाली’ का बाल संस्करण भी था. इस उपन्यास का कवर डिजाइन करते वक्त वे किताब से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने आगे चलकर फिल्म भी बनाया.

1949 में सत्यजीत रे की मुलाकात फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से हुई जो उन दिनों अपनी फिल्म ‘द रिवर’ की शूटिंग के लिए लोकेशन की तलाश में कलकत्ता आए थे. रे ने लोकेशन तलाशने में रेनोआ की मदद की. इस दौरान रेनोआ ने रे की प्रतिभा को भांप लिया और उन्हें फिल्मकार बनने की नसीहत दे डाली. सत्यजीत रे के दिमाग में फिल्म निर्माण का बीज पड़ चुका था. अब सिर्फ सही जमीन की तलाश थी.
इस बीच सत्यजीत रे अपनी कंपनी के काम से लंदन गये थे. लंदन में उन्होंने ‘बाइसकिल थीव्स’ फिल्म देखी. ‘बाइसकिल थीव्स’ देखने के साथ ही उन्होंने तय कर लिया कि वे एक दिन फिल्म बनायेंगे. भारत वापस लौटने के दौरान उनके दिमाग में ‘पाथेर पंचाली’ का खाका खींच चुका था. भारत लौटने के बाद 1952 में उन्होंने ‘पाथेर पंचाली’ फिल्म बनाना शुरू कर दिया. निर्माण के दौरान पैसे की तंगी झेलनी पड़ी तो उन्हें फिल्म प्रोडक्शन रोकना पड़ा. बाद में पश्चिम बंगाल की सरकार ने उन्हें मदद की और फिल्म पूरी हुई.

क्यों प्रसिद्ध है ‘पाथेर पंचाली’

‘पाथेर पंचाली’ गरीबी और अकेलेपन में जी रहे एक परिवार की कहानी हैं. इस परिवार में दो बच्चे हैं, जो अपनी गरीबी से अनजान अल्हड़ और मस्त जीवन जीते हैं. एक बूढ़ी महिला है जो अपने बहू का तिरस्कार झेलती है. वहीं एक पिता है जो बेहतर जिंदगी के सपने लेकर बनारस पूजा – पाठ के लिए चला जाता है. जब वापस आता है तो उसकी बेटी इस दुनिया से जा चुकी होती है.
फिल्म के किरदार कहीं से भी बनावटी नहीं लगते हैं क्योंकि सारे किरदारों को ऐसे लोगों ने जीया था, जिन्होंने कभी एक्टिंग सीखी नहीं थी. फिल्म की शूटिंग भी रियल सेट में हुई थी.
बिना कुछ शब्दों से कहे कैसे मानवीय भावनाओं को कैमरे से कहा जाये. यह सत्यजीत रे को बखूबी आता था. उन्होंने ‘चारूलता’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसे कई फिल्मों का निर्देशन किया. ईरान के मशहूर निर्देशक मजीद मजीदी को भी फिल्म बनाने की प्रेरणा सत्यजीत रे का ‘पाथेर पंचाली’ से मिली. उन्होंने सिनेमा के जादुई भाषा का सृजन किया जो इंसानी विद्रूपताओं को इतनी सहजता से कह जाती है कि आप भूल जाते है कि सिनेमा देख रहे हैं या कोई सच्ची कहानी.

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