actress chhaya kadam :तापसी पन्नू स्टारर फिल्म "गांधारी"आज से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम कर रही है.इस फिल्म की कास्टिंग में अभिनेत्री छाया कदम का नाम भी जुड़ा हुआ है.जो "लापता लेडीज" और "मडगांव एक्सप्रेस" जैसी अपनी फिल्मों से इंडस्ट्री में अपनी पहचान खास कर चुकी हैं. इस फिल्म से उनके जुड़ाव और करियर पर उर्मिला कोरी की हुई बातचीत
इस फिल्म से जुड़ने की क्या वजह थी ?
एक्टर हमेशा कुछ अलग और नया करना चाहता है. यह फिल्म वहीँ मुझे करने का मौक़ा दे रही थी. मेरे पिछले किरदारों से इसमें मेरा किरदार बहुत अलग है. इसके अलावा अपनी भूमिका के लिए मुझे बांग्ला भाषा भी सीखने को मिला. वह परदे पर कितना आ पायेगा. वह मुझे नहीं पता है लेकिन हाँ मैंने इस प्रोसेस को एन्जॉय किया. अभिनय करते करते कुछ सीख भी लिया जाए तो इससे अच्छी बात क्या होगी.शुश्रतो चटर्जी हमारे डिक्शन कोच थे. इस फिल्म को करने की वजह निर्देशक देवाशीष मखीजा भी हैं. उनका नाम अज्जी, भोंसले और जोरम जैसी फिल्मों से जुड़ा हुआ है. उनकी फिल्म अज्जी देखने के बाद मैं काफी समय से उनके साथ काम करना चाहती थी. सभी कहते हैं कि अभिनेत्रियों की एक उम्र होती हैं लेकिन उन्होंने अज्जी में 60 प्लस सुषमा देशपांडे को लीड रोल दिया था. बन्दे का विजन आप समझ सकती हैं.गांधारी ने मुझे उनके साथ काम करने का मौक़ा दिया तो मैंने लपक लिया.
गांधारी फिल्म एक माँ की कहानी है, आपकी माँ के साथ अपने रिश्ते को कैसे परिभाषित करेंगी ?
मेरे लिए मेरी मां सब कुछ थी. मां के साथ मेरा बहुत अटैचमेंट था. कई सालों बाद लड़की बड़ी होती है. फिर शादी हो जाती है. उसकी दुनिया बदल जाती है. उसके बाद उसकी प्रायोरिटी होती है पति, ससुराल और बच्चे. मेरे हिस्से में ऐसा कुछ आया नहीं. मैंने शादी नहीं की तो मेरे लिए मेरी मां ही सब कुछ थी. मेरे साथ माँ की भी उम्र बढ़ी. उसके कुछ साल बाद मां को डिमेंशिया हो गया. वो थोड़ा थोड़ा भूलते गई और मुझे भी भूल गयी. मुझे फिर माँ बनना पड़ा और वो मेरी बच्ची हो गई थी. अभी तीन साल हुए. जब मां मुझे छोड़ के चली गई, तो मेरे लिए मां यानी सब कुछ थी.
गांधारी फ़िल्म का बैकड्रॉप बंगाली है ,आपने कभी सत्यजीत राय या रितिक घटक की फिल्म देखी है क्या?
मोस्टली एक्टर देखते हैं .वो तो पढ़ाई में भी होती है.( हँसते हुए )अगर नहीं देखा होगा तो भी बोलेगा कि मैंने देखा है.वैसे बांग्ला फिल्में मुझे मराठी फिल्मों की तरह ही लगती हैं. दोनों ही फिल्मों का ट्रीटमेंट रियलिस्टिक होता है. मिटटी से जुड़ी कहानियों को प्राथमिकता मिलती है. हीरो हीरोइन वाली नहीं इंसानों की कहानी बताने में मुझे बहुत मजा आता है. इंसानों की कहानी जब होती है तो हर वक्त इंसान जीतता ही नहीं है. उसको भी हारने का डर होता है. कभी जीतता है. कभी हारता है. कभी रोता है. कभी उसको एक फ़ालतू सा बन्दा भी आकर पीटकर चला जाता है तो वैसे कैरेक्टर खेलने में मजा आता है और अभी है ना दर्शकों को इंसानों की कहानियां खुद की लगती है
क्या आप कमर्शियल सिनेमा करना पसंद नहीं करती हैं ?
ऐसा नहीं है लेकिन हाँ मुझे लेकर इंडस्ट्री में ये धारणा बन गयी है.मैंने फील किया अपने किसी परिचित डायरेक्टर को बोलती थी कि मुझे तेरे साथ काम करना है तो वह मुझे जवाब देता कि लेकिन तेरे टाइप का कुछ नहीं लिख रहा. मैंने सोचा कि मेरा टाइप है यानी मैं एक टाइप में फंसी हूँ. एक आर्टिस्ट हूँ तो मुझे इससे निकलना पड़ेगा तो अभी मैं उनको क्या बोलती हूं कि मैंने मेरे टाइप का कर लिया .अभी मुझे तेरे टाइप का करना है.फिर वो कमर्शियल सिनेमा ही क्यों न हो. हम लोग बोलते हैं ना. अरे क्या फिल्म थी यार सर दर्द होने लगा लेकिन हाउसफुल का बोर्ड थिएटर के बाहर है तो मुझे वैसे भी फिल्म करनी है. मुझे अलग-अलग चीजें सीखनी है। मुझे हर हर तरीके का ऑडियंस अपना बनाना है.
क्या आप मानती हैं कि लापता लेडीज ने आपको पॉपुलर चेहरा बनाया है ?
हां,मैं अब कहीं भी जाती हूं तो लापता लेडीज की मंजू माई की वजह से प्यार और रिस्पेक्ट बहुत बढ़ गया है.सभी मुझे मंजू माई के नाम से बुलाते हैं. मराठी फिल्म फेंड्री के वक्त भी ऐसा हुआ था.जब फ़्रेंडी फिल्म आई थी. मेरे से दुगुनी उम्र के लोग भी मुझे नानी बोलने लगे थे.सिनेमा का यही जादू होता है.
क्या निर्देशक की विश लिस्ट है ?
जिस भी निर्देशक के साथ मैंने फिल्म साइन की फिर वह मेरे लिए भगवान् है. वो जो बोलेगा मैं करुँगी.मैं पूरी तरह से डायरेक्टर एक्टर हूँ
