BPSC Success Story Dr Bijeta Kumari: डॉ बिजेता मूलरूप से बिहार के हाजीपुर की रहने वाली हैं. उन्होने BPSC 70वीं परीक्षा को रैंक 1719 के साथ क्रैक कर लिया है. बिजेता को रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर का पद मिला है. डेंटल की पढ़ाई, US हेल्थकेयर सेक्टर में काम और फिर बिहार के सबसे कठिन परीक्षा को क्रैक करना बिजेता की कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है.
BPSC Success Story Dr Bijeta Kumari: कौन हैं डॉ बिजेता कुमारी?
हाजीपुर की रहने वाली बिजेता कुमारी की परवरिश मेघालय में हुई. पिता मेघालय पुलिस में कार्यरत हैं और मां गृहिणी हैं. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा 12वीं तक शिलॉन्ग, मेघालय से पूरी की.
स्कूलिंग खत्म होने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी से डेंटल में ग्रेजुएशन किया, जो 2021 में पूरा हुआ. सिविल सर्विसेज के बारे में उन्हें पहली बार अपनी इंटर्नशिप के दौरान पता चला और यहीं से उनके मन में यह सपना पनपने लगा.
BPSC की तैयारी के लिए नौकरी से इस्तीफा
ग्रेजुएशन के बाद बिजेता अपने माता-पिता पर निर्भर नहीं रहना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने एक साल तक असोसिएट डेंटिस्ट के तौर पर काम किया. बाद में वे US हेल्थकेयर सेक्टर से जुड़ गईं और 2024 में इस्तीफा देकर पूरी तरह से BPSC की तैयारी में जुट गईं. डेंटल बैकग्राउंड से आने की वजह से इतिहास, भूगोल और राजव्यवस्था जैसे विषय उनके लिए बिल्कुल नए थे, इसलिए यह सफर आसान नहीं रहा और काफी समय लगा.
प्रीलिम्स के बाद हिंदी सीखना
डॉ बिजेता की कहानी (BPSC Success Story) में एक दिलचस्प बात यह है कि हिंदी भाषा भी बिजेता के लिए बिल्कुल नई थी. उन्होंने प्रीलिम्स के बाद हिंदी की तैयारी शुरू की, वो भी एकदम शुरुआत से यानी हिंदी के अक्षरों से. वहां से लेकर BPSC की जनरल हिंदी की तैयारी तक पहुंचना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
डेंटल क्लीनिक का टूटना
मेंस रिजल्ट में देरी होते देख बिजेता ने अपना खुद का डेंटल क्लीनिक शुरू करने का फैसला किया. लगभग 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था कि अचानक बिल्डिंग गिर गई, जिससे महीनों की मेहनत, प्लानिंग और निवेश एक झटके में खत्म हो गया. इस हादसे ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया और थका हुआ महसूस कराया. वे खुद को संभालने के लिए मेघालय अपने माता-पिता के पास लौट गईं.
BPSC में ऐसे मिली सफलता
मेघालय में रहते हुए ही मेंस का रिजल्ट आया, और इसी के साथ बिजेता को एक और मौका मिल गया. इस बार उन्होंने अपनी पूरी जान लगा दी, कोई कसर नहीं छोड़ी. नतीजा सबके सामने है, आज वो RDO के पद पर हैं. एक डेंटिस्ट से लेकर सिविल सर्वेंट बनने तक का ये सफर सिखाता है कि टूटने के बाद भी अगर हिम्मत ना हारो तो मंजिल जरूर मिलती है.
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