LLB करने वाले जरूर जानें, क्या होता है Contempt of Court?

Contempt of Court यानी अदालत की अवमानना एक ऐसा कानूनी शब्द है जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति कोर्ट के आदेश की अवहेलना करता है. इसके अलावा जब कोई व्यक्ति कोर्ट की गरिमा और अथॉरिटी को कमजोर करने वाला काम करता है.

वकालत की पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट्स के लिए कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट (Contempt of Court) सबसे दिलचस्प चैप्टर हो सकता है. यह वो टॉपिक है जो बताता है कि कोर्ट से पंगा लेना आसान नहीं, चाहे आप आम आदमी हों, वकील हों या फिर कोई बड़ा नेता. जनरल नॉलेज सेशन में आइए इसी अवमानना कानून को आसान भाषा में समझते हैं.

Contempt of Court का कानूनी आधार क्या है

Indian Kanoon की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में Contempt of Courts Act, 1971 के जरिए इसकी परिभाषा और प्रक्रिया तय की गई है. संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत सुप्रीम कोर्ट को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति मिली है, जबकि अनुच्छेद 215 के तहत यही अधिकार हाई कोर्ट को दिया गया है. इसके अलावा अनुच्छेद 19(2) में अवमानना को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक वाजिब प्रतिबंध के तौर पर रखा गया है.

अवमानना के प्रकार

कानून के तहत अवमानना को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया है, सिविल अवमानना और क्रिमिनल अवमानना. सिविल अवमानना में कोर्ट के किसी आदेश, डिक्री या निर्देश की जानबूझकर अवहेलना करना शामिल होता है. वहीं क्रिमिनल अवमानना में ऐसा कोई बयान, प्रकाशन या कृत्य आता है जो कोर्ट की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालता है.

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सिविल बनाम क्रिमिनल अवमानना

नीचे दी गई टेबल में दोनों प्रकार की अवमानना का आसान तुलनात्मक विवरण दिया गया है-

आधारसिविल अवमाननाक्रिमिनल अवमानना
परिभाषाकोर्ट के आदेश की जानबूझकर अवहेलनाकोर्ट की गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाला कृत्य
उद्देश्यआदेश का पालन करवानान्याय प्रक्रिया की सुरक्षा करना
उदाहरणकोर्ट के फैसले का पालन न करनागलत बयानबाजी या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा
प्रकृतिज्यादातर व्यक्तिगत विवाद से जुड़ीन्यायपालिका की छवि से जुड़ी
  • निचली अदालतों को खुद अवमानना के लिए सजा देने का अधिकार नहीं है, यह अधिकार सिर्फ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास है.
  • माफी मांगने पर कोर्ट आरोपी की सजा माफ कर सकता है.
  • यह कानून यूपीएससी, न्यायिक सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पॉलिटी सेक्शन का अहम हिस्सा है.
  • समय-समय पर इस कानून में बदलाव की मांग भी उठती रही है, ताकि न्यायिक जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे.

सजा का प्रावधान

Contempt of Courts Act, 1971 के अनुसार दोषी पाए जाने पर छह महीने तक की साधारण कैद या दो हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों दिए जा सकते हैं. साल 2006 में इस कानून में संशोधन कर सत्य और सद्भावना को एक बचाव के तौर पर जोड़ा गया, ताकि निष्पक्ष आलोचना को अवमानना न माना जाए.

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लेखक के बारे में

By रवि मल्लिक

रवि मल्लिक पिछले 7 सालों से डिजिटल पत्रकारिता से जुड़े हैं. स्कूली शिक्षा से लेकर नौकरी तक की खबरों पर काम करना पसंद है. युवाओं को बेहतर करियर ऑप्शन, करंट अफेयर्स और नई वैकेंसी के बारे में बताना अच्छा लगता है. बोर्ड परीक्षा हो या UPSC, JEE और NEET एग्जाम टॉपर्स से बात करना और उनकी स्ट्रेटजी के बारे में जानना पसंद है. युवाओं को प्रेरित करने के लिए उनके बीच के मुद्दों को उठाना और सही व सटीक जानकारी देना ही उनकी प्राथमिकता है.

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