PM Jan Dhan Yojana: 12 साल में कितनी बदली आम लोगों की बैंकिंग, खाते से DBT और डिजिटल पेमेंट तक समझें पूरी तस्वीर

PM Jan Dhan Yojana: प्रधानमंत्री जनधन योजना यानी PMJDY को शुरू हुए 12 साल हो चुके हैं. 28 अगस्त 2014 को शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य उन लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था, जो अब तक औपचारिक वित्तीय प्रणाली से बाहर थे. योजना के तहत बिना न्यूनतम बैलेंस के बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट खोलने की सुविधा दी गई. इसके साथ RuPay डेबिट कार्ड, ओवरड्राफ्ट और बीमा जैसी सुविधाओं को भी जोड़ा गया.

PM Jan Dhan Yojana: 12 साल बाद तस्वीर सिर्फ बैंक खातों की संख्या तक सीमित नहीं है. जनधन खाते सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी DBT, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और डिजिटल वित्तीय सेवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बने हैं. लेकिन वित्तीय समावेशन का असली आकलन यह देखकर करना होगा कि खाते कितने खुले और उनमें से कितने सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं.

59 करोड़ से ज्यादा जनधन खाते, जमा राशि 3.15 लाख करोड़ रुपये के पार

वित्त मंत्रालय के प्रधानमंत्री जनधन योजना पोर्टल पर उपलब्ध 26 अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 59.15 करोड़ जनधन खाते हैं. इनमें ग्रामीण और अर्धशहरी बैंक शाखाओं में करीब 45.99 करोड़, जबकि शहरी और महानगरीय केंद्रों में करीब 13.16 करोड़ खाते हैं.

इन खातों में कुल जमा राशि करीब ₹3,15,482 करोड़ है. यानी जनधन खाते अब केवल सरकारी लाभ पाने के लिए बनाए गए निष्क्रिय खाते भर नहीं रह गए हैं, बल्कि इनमें लोगों की जमा पूंजी भी मौजूद है.

सबसे बड़ा बदलाव: बैंक खाता अब सरकारी मदद का सीधा रास्ता

जनधन योजना का एक बड़ा फायदा यह रहा कि बैंक खाते को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ना आसान हुआ. DBT व्यवस्था के जरिए सरकार विभिन्न योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेज सकती है.

DBT भारत के आधिकारिक पोर्टल के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक ₹2,06,360 करोड़ का प्रत्यक्ष लाभ अंतरण दर्ज किया गया है, जबकि संचयी DBT ट्रांसफर ₹53.23 लाख करोड़ से अधिक है. हालांकि यह पूरी राशि केवल जनधन खातों के जरिए नहीं गई है, इसलिए इसे PMJDY की उपलब्धि के रूप में सीधे जोड़ना सही नहीं होगा. जनधन खाते DBT इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन DBT का पूरा आंकड़ा सभी पात्र बैंक खातों और योजनाओं को समाहित करता है.

यही बदलाव वित्तीय समावेशन का महत्वपूर्ण पहलू है. पहले सरकारी सहायता हासिल करने के लिए नकद भुगतान, बिचौलियों या स्थानीय स्तर की व्यवस्था पर निर्भरता ज्यादा थी. बैंक खाते के जरिए भुगतान होने से पैसा सीधे लाभार्थी तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हुई.

महिलाओं की बैंकिंग भागीदारी भी बढ़ी

जनधन योजना की एक खास उपलब्धि महिलाओं की बैंकिंग पहुंच में विस्तार है. 26 अगस्त 2026 के आंकड़ों में करीब 32.96 करोड़ महिला लाभार्थी दर्ज हैं. यानी कुल जनधन खातों में महिलाओं की हिस्सेदारी आधे से ज्यादा है.

इसका महत्व केवल बैंक खाता होने तक सीमित नहीं है. जब महिलाओं के नाम पर बैंक खाता होता है, तो सरकारी सहायता, बचत और अन्य वित्तीय सेवाओं तक उनकी सीधी पहुंच बढ़ सकती है.

RuPay कार्ड से डिजिटल वित्त की ओर कदम

जनधन खाताधारकों को RuPay डेबिट कार्ड भी उपलब्ध कराया जाता है. 26 अगस्त 2026 तक करीब 41.34 करोड़ RuPay कार्ड जारी किए जा चुके थे.

हालांकि यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा. RuPay कार्ड जारी होना और उसका नियमित इस्तेमाल होना एक ही बात नहीं है. इसी तरह बैंक खाते में पैसा जमा होना भी खाते के नियमित इस्तेमाल का पूर्ण प्रमाण नहीं है.

इसलिए जनधन योजना के 12 साल का अगला चरण सिर्फ खाते खोलने के बजाय खातों के सक्रिय इस्तेमाल, डिजिटल भुगतान, बीमा, पेंशन, बचत और छोटे कर्ज जैसी सेवाओं तक वास्तविक पहुंच बढ़ाने का होना चाहिए.

डिजिटल पेमेंट ने बदली बैंकिंग की तस्वीर

पिछले एक दशक में भारत का डिजिटल भुगतान ढांचा तेजी से बढ़ा है. UPI, AePS, मोबाइल बैंकिंग और अन्य डिजिटल माध्यमों ने बैंकिंग को शाखा और एटीएम की सीमा से बाहर पहुंचाया है.

RBI ने भी वित्तीय और डिजिटल समावेशन को आगे बढ़ाने के लिए डिजिटल बैंकिंग यूनिट, UPI के नए उपयोग, ऑफलाइन भुगतान और अन्य डिजिटल माध्यमों के विस्तार को रेखांकित किया है.

हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में डिजिटल भुगतान की पूरी वृद्धि केवल जनधन योजना की वजह से हुई. UPI और डिजिटल पेमेंट का विस्तार एक व्यापक डिजिटल वित्तीय इकोसिस्टम का परिणाम है. जनधन योजना ने इस इकोसिस्टम के लिए बड़ी संख्या में लोगों को औपचारिक बैंकिंग नेटवर्क से जोड़ने का काम किया.

क्या हर जनधन खाता सक्रिय है?

यहीं से जनधन योजना की अगली चुनौती सामने आती है. खाता खुलना वित्तीय समावेशन की पहली सीढ़ी है, अंतिम मंजिल नहीं.

RBI ने वित्तीय समावेशन से जुड़ी अपनी रणनीति में निष्क्रिय या इनऑपरेटिव खातों की समस्या को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है. इसके पीछे नियमित आय का अभाव, वित्तीय उत्पादों की जानकारी की कमी, जागरूकता की कमी और बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच जैसी वजहें हो सकती हैं.

इसलिए 59 करोड़ से ज्यादा खातों का आंकड़ा निश्चित तौर पर बड़ी पहुंच दिखाता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी खाताधारक हर महीने खाते का इस्तेमाल करते हैं.


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By अरबिंद कुमार मिश्रा

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