Paraquat Dichloride : एक ऐसा खतरनाक केमिकल, जिसकी महज कुछ बूंदें किसी भी इंसान की जिंदगी को हमेशा के लिए खत्म कर सकती हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि अगर यह शरीर में चला जाए, तो दुनिया में इसका कोई एंटीडोट (काट) तक मौजूद नहीं है. लेकिन भारत के रेगुलेशन सिस्टम की कमजोरी देखिए कि दुनिया का यह सबसे घातक जहर आज हमारे देश के खेतों में खुलेआम छिड़का जा रहा है.
खेतों में खरपतवारनाशक (Herbicides/Weedicide) के तौर पर इस्तेमाल होने वाले इस केमिकल का नाम है पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride). यह फसलों की आड़ में हमारी मिट्टी, पर्यावरण और अन्नदाताओं की जिंदगी में धीमा जहर घोल रहा है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर के करीब 74 देशों ने इसे पूरी तरह से बैन कर दिया है, लेकिन भारत की मिट्टी में हर साल सैकड़ों मीट्रिक टन यह केमिकल उड़ेला जा रहा है.
कपड़े रंगने वाली डाई से ‘जहर’
पैराक्वाट का सफरनामा बेहद चौंकाने वाला है. दो ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिकों ने इसे लैब में तैयार किया. तब इसे ‘मिथाइल वायलोन’ कहा जाता था और इसका इस्तेमाल सिर्फ कपड़ों को रंगने के लिए एक ‘केमिकल डाई’ के रूप में होता था.
ब्रिटेन की ‘जिलॉट्स हिल’ लैब के वैज्ञानिकों ने खोजा कि यह केमिकल पौधों को बहुत तेजी से सुखाकर नष्ट कर सकता है. फिर साल 1961-62 में ब्रिटिश कंपनी ICI ने इसका कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू किया और इसे दुनिया भर के बाजार में ‘ग्रामोक्सोन’ ब्रांड नाम से उतारा.
जिन देशों ने इस जहर को खोजा और इससे अरबों का मुनाफा कमाया, उन्होंने अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए इसे बरसों पहले बैन कर दिया था. ऑस्ट्रिया ने 1993, स्विट्जरलैंड ने 1989, ब्रिटेन ने 2007 और चीन ने 2017 में इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी थी. हालांकि, इसे बनाने वाली ग्लोबल कंपनियों (जैसे सिंजेटा) को विदेशों में इसे बेचकर मुनाफा कमाने की खुली छूट मिलती रही.
भारत में एंट्री और ‘कमेटी की कानूनी ढाल’
भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) के दौर में इस केमिकल को बाजार में एंट्री मिली. हमारे देश में कीटनाशकों को मंजूरी देने वाली संस्था ‘सेंट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी’ (CIBRC) ने ‘पैराक्वाट डाइक्लोराइड 24% SL’ को केवल 9 फसलों (चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर) में इस्तेमाल के लिए रजिस्टर्ड किया था.
बैन न होने की असली वजह
साल 2013 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने दुनिया भर में प्रतिबंधित हो चुके 66 कीटनाशकों की समीक्षा के लिए डॉ. अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. इस कमेटी ने साल 2015 में कुछ शर्तों (जैसे सुरक्षित पैकेजिंग, किसानों और डॉक्टरों की ट्रेनिंग) के साथ पैराक्वाट डाइक्लोराइड को भारत में इस्तेमाल की हरी झंडी दे दी. लेकिन जमीन पर ये सारे सुरक्षा मानक सिर्फ कागजी साबित हो रहे हैं.
थाली तक पहुंच रहा है जहर
इस समय भारत के खेतों में हर साल 100 मीट्रिक टन से ज्यादा पैराक्वाट का छिड़काव हो रहा है. सबसे डरावनी स्थिति राजस्थान और मध्य प्रदेश के खेतों में देखने को मिल रही है.
मजदूर और लेबर का खर्च बचाने के चक्कर में किसान खड़ी मूंग की फसल को जल्दी सुखाने के लिए इस घातक केमिकल का छिड़काव कर रहे हैं. महज दो दिनों में जबरन सुखाकर काटी गई यह मूंग सीधे मंडियों से होते हुए हमारी और आपकी थाली तक पहुंच रही है.
.यानी बिना जाने हम और हमारा परिवार इस जानलेवा जहर को अपने पेट में डाल रहे हैं. खेतों में बिना ग्लव्स, मास्क या चश्मे के इसका छिड़काव करने वाले गरीब किसान और मजदूर फेफड़ों, किडनी और त्वचा की गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.
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