थाली पर मंडराया महंगाई का खतरा, युद्ध से तेल-चीनी और खाद महंगे हो सकते हैं

Iran War Impact: ईरान-इजरायल युद्ध की वजह से सप्लाई चैन टूटने का खतरा है. इसका सीधा असर भारत में खाने के तेल, चीनी और खाद (Fertilizer) की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे आम आदमी की थाली महंगी हो सकती है.

Iran War Impact: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर अब भारत में खाने के तेल की कीमतों पर भी दिखने लगा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में खाने का तेल और महंगा हो सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा है.

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगाता है. देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 60% खाने का तेल आयात किया जाता है. ऐसे में जब भी दुनिया में सप्लाई में रुकावट आती है या ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, तो उसका सीधा असर भारत में तेल की कीमतों पर पड़ता है.

फॉर्च्यून इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार इमामी एग्रोटेक लिमिटेड के सीईओ और इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के चेयरमैन सुधाकर देसाई का कहना है कि ईंधन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने से पहले ही खाने के तेल के दाम ऊपर जाने लगे हैं. उनके मुताबिक, हाल के समय में फ्यूल की कीमतें करीब 16–17% बढ़ी हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट और शिपिंग महंगी हो गई है. इसी वजह से पाम और सोया तेल के दाम करीब 4–5% बढ़ चुके हैं, जबकि सनफ्लावर ऑयल पर ज्यादा दबाव है क्योंकि इसकी सप्लाई का बड़ा हिस्सा ब्लैक सी क्षेत्र से आता है.

कच्चे तेल से क्यों बढ़ता है खाने के तेल का दाम

खाने के तेल की कीमतें कच्चे तेल से भी जुड़ी होती हैं. जब क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो कई देश बायोडीजल का ज्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं. बायोडीजल बनाने के लिए पाम और सोयाबीन जैसे वनस्पति तेल का इस्तेमाल किया जाता है. पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के बोर्ड के सलाहकार चंद्र प्रकाश पांडे के अनुसार, मौजूदा तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें जनवरी 2025 के बाद सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच चुकी हैं. ऐसे में बायोडीजल की मांग बढ़ती है और इसका असर सीधे खाने के तेल की कीमतों पर पड़ता है.

सप्लाई और शिपिंग भी हुई महंगी

ग्लोबल सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है. कई शिपिंग कंपनियां इस क्षेत्र में नई बुकिंग लेने से बच रही हैं या फिर 1,500 से 3,000 डॉलर तक का अतिरिक्त “वॉर रिस्क चार्ज” लगा रही हैं. इसके अलावा Strait of Hormuz में व्यापार प्रभावित होने से जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे ट्रांसपोर्ट लागत और बढ़ रही है.

होर्मुज स्ट्रेट

कीमतों में पहले ही दिखने लगा असर

बाजार में इसका असर दिखाई भी देने लगा है. रिपोर्ट के मुताबिक पाम ऑयल की कीमत करीब 5% बढ़ चुकी है, जबकि सनफ्लावर ऑयल करीब 16% महंगा हो गया है. वहीं कच्चा तेल फरवरी में करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था, जो संकट के दौरान 120 डॉलर तक पहुंच गया और अभी भी करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है.

एथेनॉल महंगा हुआ तो चीनी के दाम बढ़ सकते हैं

दुनिया में सबसे ज्यादा गन्ने की खेती Brazil में होती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार जब एथेनॉल की कीमतें बढ़ती हैं, तो गन्ना मिलें ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल बनाने पर ज्यादा ध्यान देने लगती हैं. अगर ऐसा होता है तो बाजार में चीनी की सप्लाई कम हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दाम बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है.

रिपोर्ट के अनुसार हाल के समय में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से एथेनॉल की मांग भी बढ़ गई है. एथेनॉल का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर भी किया जाता है, इसलिए तेल महंगा होने पर इसकी मांग बढ़ जाती है. इसी वजह से हाल ही में एथेनॉल की कीमतों में करीब 10% तक उछाल देखा गया है.

यूरिया के दाम में तेज बढ़ोतरी

दूसरी ओर, उर्वरक यानी खाद की कीमतों पर भी असर पड़ रहा है. तेल और गैस की रिफाइनिंग के दौरान सल्फर बड़ी मात्रा में निकलता है, जिसका इस्तेमाल खाद बनाने और कई फैक्ट्रियों में किया जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में मौजूद सल्फर का करीब आधा हिस्सा इस समय Strait of Hormuz के आसपास फंसा हुआ है. यह रास्ता ग्लोबल मार्केट के लिए बेहद अहम माना जाता है.

दुनिया में बिकने वाली करीब एक-तिहाई यूरिया इसी रास्ते से होकर गुजरती है. यूरिया का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में बनता है, क्योंकि प्राकृतिक गैस उर्वरक उत्पादन का सबसे अहम कच्चा माल है. इसी वजह से क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद यूरिया की कीमतों में करीब 35% तक की बढ़ोतरी हो चुकी है. अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहते हैं, तो खाद के दाम और बढ़ सकते हैं, जिससे खेती की लागत पर भी असर पड़ सकता है.

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By Abhishek pandey

अभिषेक पाण्डेय पिछले तीन वर्षों से प्रभात खबर में डिजिटल जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहे हैं। वे बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं। शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, MSME, कृषि और इंडस्ट्री जैसे विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे रिसर्च के साथ ऐसी खबरें और एक्सप्लेनर तैयार करते हैं, जिन्हें आम लोग भी आसानी से समझ सकें। इसके अलावा यूटिलिटी न्यूज और सक्सेस स्टोरीज लिखने में भी उनकी खास रुचि है।

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अभिषेक ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से की है, जिसे पत्रकारिता की दुनिया में 'दादा माखनलाल की बगिया' भी कहा जाता है।

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अभिषेक पाण्डेय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने रिपोर्टिंग, डिजिटल मीडिया, न्यूज़ राइटिंग, वीडियो प्रोडक्शन और मल्टीमीडिया जर्नलिज्म की बारीकियां सीखीं, जिनका इस्तेमाल वे आज अपनी पत्रकारिता में कर रहे हैं।

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