लेखक- शिवपूजन सिंह
शेयर बाजार की लगातार गिरावट से निवेशकों का बढ़ता डर और भरोसा डगमगा गया है. पिछले साल से ही बाजार लगभग लाल निशान पर ही दिखलाई पड़ रहा है. एक बेचैनी और अकुलाहट पासरी हुई है और धैर्य भी अब जवाब देने की दहलीज पर खड़ा दिखता है.
सवाल है कि क्या बाजार इसी तरह कमजोर ही रहेगा? क्या फिर बहार नहीं आएगी? लाल निशान से हरे पर नहीं लौटेगा? ये तमाम प्रश्न आज भी निवेशकों कों असहज करते है. लाजमी है कि अभी हाल तो अच्छा नहीं है.
पिछले एक साल का प्रदर्शन
पिछले एक साल में देंखे तो भारतीय इंडेक्स निफ्टी-50 का रिटर्न्स -4.31% रहा. जो की नकारात्मक रहा यहां पैसा नहीं बना बल्कि नुकसान हुआ . पिछले एक साल में निफ्टी-50 का उच्चतम स्तर 26,373.20 और निचला स्तर 22,182. 55 का रहा. अभी 50 शेयर्स का सूचकांक निफ्टी-50 23,700 के आसपास ट्रेड कर रहा है यानी अभी भी एक रेंज में ही फंसा हुआ है. आगे क्या होगा यह पहेली बना हुआ है.
बाजार में कब आएगी बहार?
अभी जो बाजार की सूरत या चाल कहे तो सुस्त है. जबतक यह अपने हाई यानी 26373.20 लेवल कों ब्रेक नहीं करेगा, तबतक मार्केट की रफ्तार ऐसी ही मंद रहेगी. हालांकि ऐसे आसार है कि अगस्त के आखरी हफ्ते तक कुछ सुधार निफ्टी-50 इंडेक्स में देखने को मिल सकती है.
आखिर क्यों है बाजार की सुस्त चाल?
बाजार में यह गिरावट और इसकी धीमी चाल की कई वजहें रहीं जिसमें,
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली- विदेशी संस्थागत निवेशकों ने समय -समय पर भारतीय शेयर्स बाजार से पैसा निकालते रहें, जिसके चलते बाजार पर दबाव ज्यादा बना
- अमेरिका का लगाया गया मनमाना टैरिफ- अमेरिका ने इस दरमियान कई देशो पर मनमाना टैरिफ लगाया, भारत पर भी इसका बोझ डाला गया जिसका असर भारतीय बाजार पर अच्छा खासा पड़ा
- ईरान का इजरायल-अमेरिका से जंग- अभी भी यह जंग चल रहीं है, जिसके चलते ग्लोबल इम्पैक्ट दुनिया के बाजार में पड़ रहा है.
- होर्मूज- तेल-गैस की सप्लाई नहीं होने से भारतीय बाजार पर इसका अच्छा असर देखने को मिला
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें- कच्चे तेल के भाव बढ़ने से भी बाजार पर एक नेगेटिव इम्पैक्ट मार्केट में पड़ा. इससे महंगाई बढ़ती है और कारोबार घाटा और कम्पनियों की लागत बढ़ती है.
- रुपये और बांड-यील्ड का दबाव- रुपये का कमजोर होने से और ग्लोबल बांड यील्ड के बढ़ने से भी शेयर बाजार पर प्रभाव डाला. निवेशकों का रुझान शैयर्स पर कम हुआ. इसके चलते बाजार में मुनाफा वसूली भी हुई और बाजार गिरा.
आगे कैसी रहेगी शेयर बाजार की चाल?
बाजार के नजर और इतिहास के पन्ने पलटे तो ये बात साफ-साफ अंकित है कि बाजार थोड़े समय के लिए गिरावट में रहती है. इसकी प्रकृति बढ़ने की ही रहीं है. आप 2008 की वैश्विक मंदी को देखे तो लेमन ब्रदर्स क्राइसिस के वक्त दुनिया भर के बाजार लाल निशान पर थे. भारतीय शेयर बाजार भी उस दरमियान 60% तकरीबन गिर गए थे. जो कि रिकॉर्ड गिरावट थी.वही 2020 में कोरोना महामारी के चलते तकरीबन 37% गिरावट भारतीय बाजार में देखी गई थी. इससे तुलना अभी करें तो इसबार की गिरावट उतनी नहीं है. सच्चाई ये भी है कि हर बड़ी गिरावट के बाद मार्केट में तेज रैली आती है. इसीलिए यह विपरीत समय में घबराने की जरुरत नहीं है बल्कि धैर्य बनाये रखने की जरुरत है. भारत दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. लिहाज हम समझ सकते है कि यह कितनी मजबूत है. असल हकीकत ये भी है कि बाजार कि गिरावट मायूसी नहीं एक अवसर लेकर आरी है. जहां निवेश का बेहतरीन और साजगार मौका होता है. जो एक समय के बाद बड़ा पैसा निवेशकों को बनाकर देता है.
