Economic Survey: जब हम अपनी कमाई से ज्यादा खर्च कर देते हैं, तो हमें उधार लेना पड़ता है. सरकार के साथ भी ऐसा ही होता है, जिसे किताबी भाषा में ‘राजकोषीय घाटा’ (Fiscal Deficit) कहते हैं. इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि सरकार अब अपने खर्चों को लेकर काफी सतर्क हो गई है और देश की फाइनेंशियल हेल्थ पहले से बेहतर हो रही है.
क्या सरकार ने बजट का लक्ष्य हासिल कर लिया?
जी हां, सरकार ने इस मोर्चे पर उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है. वित्त वर्ष 2024-25 के लिए सरकार ने लक्ष्य रखा था कि घाटा 4.9% रहेगा, लेकिन असलियत में यह इससे भी कम यानी 4.8% पर सिमट गया था. यह इस बात का संकेत है कि सरकार अपनी आमदनी और खर्च के बीच का बैलेंस बनाने में कामयाब रही है.
पिछले सालों के मुकाबले हम कहां खड़े हैं?
अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो कोरोना काल (2021-22) में यह घाटा 6.71% तक पहुंच गया था. लेकिन तब से अब तक इसमें लगातार गिरावट आई है.
नीचे दी गई टेबल से इसे समझिए:
| साल | राजकोषीय घाटा (%) | स्थिति |
| 2021–22 | 6.71% | कोविड का बड़ा असर |
| 2022–23 | 6.4% | सुधार की शुरुआत |
| 2023–24 | 5.6% | तेज़ रिकवरी |
| 2024–25 | 4.8% | शानदार उपलब्धि |
आने वाले कल के लिए क्या है तैयारी?
सरकार ने अब अपने लिए और भी कड़ा लक्ष्य रखा है. अगले साल यानी वित्त वर्ष 2025-26 के लिए इस घाटे को घटाकर 4.4% तक लाने की तैयारी है. इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार कर्ज पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है, ताकि देश की अर्थव्यवस्था और मजबूत हो सके.
क्या इस पैसे से आम जनता को फायदा होगा?
जब सरकार का घाटा कम होता है, तो उसकी साख (Rating) बढ़ती है और महंगाई को कंट्रोल करने में मदद मिलती है. घाटा कम होने से जो पैसा बचता है, उसे सरकार सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च कर सकती है, जिससे लंबे समय में आम आदमी का जीवन आसान होता है.
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