कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड बुधवार को 1.1% चढ़कर 96.25 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 1.46% बढ़कर 91.54 डॉलर प्रति बैरल हो गया. अब बाजार की नजर ब्रेंट के 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर पर है.
तेल की कीमतों में यह उछाल ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया है. ईरान से जुड़े इलाकों में अमेरिकी हमलों और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता ने कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बाजार की टेंशन बढ़ा दी है.
तेल के दाम अचानक क्यों चढ़ गए?
मंगलवार को भी कच्चे तेल में तेज उछाल आया था. उस दिन ब्रेंट करीब 4.5% बढ़कर 94.52 डॉलर और WTI लगभग 5% चढ़कर 90.03 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया था. यह तेजी उस समय आई, जब अमेरिका ने ईरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC से जुड़े ठिकानों पर नए हमले शुरू किए. US सेंट्रल कमांड के मुताबिक, यह कार्रवाई कमर्शियल शिपिंग और अमेरिकी सैनिकों पर IRGC की ओर से किए गए हमलों की कोशिश के बाद की गई. यानी अभी तेल बाजार में सबसे बड़ी चिंता सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि उससे तेल की सप्लाई और समुद्री आवाजाही पर पड़ने वाला असर है.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज इतना अहम क्यों है?
कच्चे तेल के बाजार में सबसे ज्यादा चिंता स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर है. यह समुद्री रास्ता तेल की सप्लाई के लिए बेहद अहम है. यहां लंबे समय तक किसी तरह की रुकावट आती है, तो दुनिया के कई हिस्सों में तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है. सोमवार को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजर रहे एक टैंकर पर तीन अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ. UK मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर के मुताबिक, इस घटना में किसी की जान नहीं गई.
यही वजह है कि बाजार की नजर अब इस इलाके में होने वाली हर नई गतिविधि पर है. अगर जहाजों की आवाजाही पर लगातार खतरा बना रहा, तो कच्चे तेल की कीमतों में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ सकती है.
अमेरिका और ईरान के बीच अभी क्या चल रहा है?
ईरान ने पहले लारक आइलैंड पर हुए अमेरिकी हमले के जवाब में जॉर्डन में मौजूद दो अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों का जवाब देने की चेतावनी दी.
हालांकि, मौजूदा संकेतों के मुताबिक दोनों पक्ष फिलहाल पूरी तरह से फुल-स्केल वॉर की ओर लौटना नहीं चाहते. एनालिस्ट्स ने लारक आइलैंड पर अमेरिकी कार्रवाई को मौजूदा गतिरोध तोड़ने की कोशिश के तौर पर भी देखा है.
भारत के लिए महंगा तेल क्यों है चिंता की बात?
ब्रेंट के 100 डॉलर के करीब पहुंचने से भारत में ऑयल और गैस कंपनियों के शेयर भी फोकस में रहेंगे. निवेशक यह देखेंगे कि महंगे कच्चे तेल का कंपनियों के मार्जिन और फ्यूल कॉस्ट पर कितना असर पड़ता है. आम लोगों के लिए भी कच्चे तेल की कीमतों की चाल अहम है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो ईंधन की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी नजर इस बात पर है कि अमेरिका-ईरान तनाव आगे कितना बढ़ता है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही कितनी सुरक्षित रहती है. यही तय करेगा कि ब्रेंट 100 डॉलर के स्तर की ओर बढ़ता है या फिर तेजी पर ब्रेक लगता है.
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