Cost of raising a child in india : शहरी भारत में नए माता-पिता अक्सर इस बात को स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं कि एक छोटे बच्चे की जरूरतों पर होने वाला खर्च उम्मीद से कहीं ज्यादा है. अस्पताल के बिल से लेकर डायपर और वैक्सीन तक, हर छोटी चीज का अपना एक बड़ा गणित है. Kidbea ( बांस के पौधों पर आधारित एक किड्स फैशन ब्रांड) के फाउन्डर स्वप्निल श्रीवास्तव के मुताबिक, एक बच्चे को 18 साल की उम्र तक पालने का कुल खर्च ₹30 लाख से ₹1.2 करोड़ के बीच हो सकता है. आईए समझते है आसान भाषा में खर्च का फॉर्मूला.
अस्पताल और शुरुआती स्वास्थ्य खर्च
बच्चे के जन्म के साथ ही खर्चों की शुरुआत हो जाती है. शहरी इलाकों के प्राइवेट अस्पतालों में डिलीवरी का खर्च ₹50,000 से ₹2.5 लाख के बीच रहता है. इसके बाद शुरुआती सालों में वैक्सीनेशन (टीकाकरण) और पीडियाट्रिक (बाल रोग विशेषज्ञ) की फीस का बजट ₹50,000 से ₹80,000 तक पहुंच जाता है, जो पूरी तरह से अस्पताल और ऑप्शनल वैक्सीन्स के सिलेक्शन पर निर्भर करता है.
डायपर, खाना और रोजमर्रा की जरूरतें
शुरुआती 2-3 सालों में डायपर और वाइप्स पर होने वाला खर्च अक्सर माता-पिता को चौंका देता है. अगर बच्चा दिन में 5 डायपर इस्तेमाल करता है, तो 900 दिनों में यह करीब 4,500 डायपर होते हैं, जिसकी कीमत ₹35,000 से ₹70,000 के बीच बैठती है. इसी तरह, बेबी फूड और फॉर्मूला मिल्क (ऊपर का दूध) का खर्च ₹60,000 से ₹1.2 लाख तक जा सकता है, खासकर अगर आप प्रीमियम ब्रांड्स का चुनाव करते हैं.
कपड़े, गियर और अन्य सामान
बच्चे के कपड़े, पालना (Crib), बेबी कैरियर, खिलौने और अन्य जरूरी सामानों पर शहरी माता-पिता ₹60,000 से ₹1.5 लाख तक खर्च कर देते हैं. इसमें वह ‘रैंडम शॉपिंग’ शामिल नहीं है जो माता-पिता अक्सर भावनाओं में बहकर कर लेते हैं. यह खर्च डेकेयर या प्लेस्कूल की भारी-भरकम फीस शुरू होने से पहले का है.
भविष्य का अनुमान और बदलती पीढ़ी
मेट्रो शहरों में रहने वाले परिवारों के लिए 18 साल तक बच्चे की परवरिश का खर्च ₹1 करोड़ के आंकड़े को आसानी से छू लेता है. आज की पीढ़ी के भारतीय माता-पिता अपने बच्चों पर पिछली किसी भी पीढ़ी की तुलना में कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं. यही वजह है कि बेबी केयर और एजुकेशन सेक्टर में निवेश और व्यापार की संभावनाएं हमेशा मजबूत (Bullish) बनी रहती हैं.
