EV में आग क्यों लगती है? क्या पेट्रोल कारों से ज्यादा है खतरा? ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट ने बताया पूरा खेल

इलेक्ट्रिक कार (EV) में आग लगने के डर को लेकर ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट ने खास बातचीत की है. उन्होंने बताया कि नई टेक्नोलॉजी को अपनाने में समय लगता है और सेफ्टी बरतना सबसे जरूरी है.

इलेक्ट्रिक कार (EV) आज के समय मे सड़कों पर तेजी से बढ़ रही है लेकिन ग्राहकों के मन मे अभी भी एक डर बना हुआ है. यह डर है ईवी मे आग लगने और रेंज खत्म होने का. आखिर नई ईवी खरीदते समय हमे किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या सच मे इलेक्ट्रिक कारों मे आग का खतरा पेट्रोल कारों से ज्यादा है? इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए हमने ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट सुवासित श्रीवास्तव से खास बातचीत की है. आइए इसे समझते है.

नई टेक्नोलॉजी को अपनाने मे लगता है समय

ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट सुवासित श्रीवास्तव का कहना है कि किसी भी नई टेक्नोलॉजी को अपनाने मे लोगो को समय लगता है. अगर आप याद करे कि जिस वक्त मार्केट मे सीएनजी (CNG) आई थी, उस वक्त भी लोगो और सरकार को बहुत परेशानी हुई थी. लोगो को लगता था कि सीएनजी कार सेफ नहीं है और इसमे आग लग सकती है. लेकिन आज सीएनजी आम बात हो गई है. आग लगने की दुर्घटना केवल ईवी तक सीमित नहीं है. आग तब लगती है जब हम किसी चीज को इग्नोर करते है. चाहे वो पेट्रोल हो, डीजल हो या इलेक्ट्रिक, अगर सावधानी नहीं बरतेंगे तो दुर्घटना तो होगी ही.

ईवी मे आग लगने के असली टेक्निकल कारण

आग लगने के पीछे कई कारण होते है. बीते दिनो कई खबरे आई कि पार्किंग मे गाड़ी चार्ज हो रही थी और आग लग गई. दरअसल, शॉर्ट सर्किट कही भी हो सकता है. कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी पार्किंग मे चार्जिंग के लिए सही और स्टैंडर्ड वायरिंग का इस्तेमाल नहीं करते है. अगर आप अपने घर मे भी किसी उपकरण के लिए सस्ते और बिना स्टैंडर्ड वाले तार का इस्तेमाल करेंगे, तो वहां भी आग का डर बना रहेगा.

एक और बड़ा टेक्निकल फैक्टर यह है कि शुरुआत मे ज्यादातर ईवी यूरोपियन स्टैंडर्ड पर तैयार किए गए थे या चीन से सोर्स किए गए थे. यूरोप का मौसम हमारे यहा जैसा नहीं है. वहा ठंड होती है, जबकि भारत का मौसम काफी गरम और अलग (हार्श) होता है. यह भी एक अहम फैक्टर है. लेकिन अब भारतीय कंपनिया इस पर बहुत अच्छे से काम कर रही है. यही वजह है कि नई गाड़ियों मे आग लगने जैसी दिक्कते पहले के मुकाबले अब काफी कम देखने को मिल रही है.

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क्या ओवरचार्जिंग और सस्ते चार्जर से है खतरा?

बहुत से ग्राहकों को लगता है कि गाड़ी को 100 परसेंट तक चार्ज करने से बैटरी ओवरचार्ज हो जाएगी और फट जाएगी. इस पर एक्सपर्ट साफ कहते है कि ओवरचार्ज जैसी कोई चीज नहीं होती. जिस तरह आपका मोबाइल फोन फुल चार्ज होने के बाद अपने आप चार्ज होना बंद हो जाता है, वैसे ही ईवी मे भी सिस्टम होता है. असली खतरा गलत और इनकंपेटिबल चार्जर से है. फुल चार्ज के लिए 15 एंपियर का प्लग चाहिए और आप छोटा प्लग लगा रहे है, तो आप खुद दुर्घटना को बुलावा दे रहे है.

पेट्रोल कार बनाम इलेक्ट्रिक कार: डर और हकीकत

लोगों के मन मे इलेक्ट्रिक कारों को लेकर कई भ्रम है. सुवासित श्रीवास्तव ऑटोमोबाईल expert ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि करीब दो साल पहले गुडगाव की कई सोसाइटी ने बेसमेंट मे ईवी चार्जर लगाने से मना कर दिया था. उनका सोचना था कि शॉर्ट सर्किट से सोसाइटी मे आग लग सकती है. लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि उसी बेसमेंट मे 1000 पेट्रोल कारे खडी है. पेट्रोल कार भी तो एक बडा पोटेंशियल रिस्क है. अगर किसी एक कार मे आग लगी, तो नुकसान कितना बड़ा होगा, यह हम सब समझते है. इसलिए ईवी का डर थोडा साइकोलॉजिकल ज्यादा है.

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रेंज की टेंशन और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर

लोगो को ईवी अपनाने मे जो सबसे बड़ा डर है, वह है रेंज एंग्जायटी. लोगों के दिमाग मे बैठा है कि बीच रास्ते मे बैटरी खत्म हो गई तो क्या होगा. सुवासित जी अपना निजी अनुभव बताते है कि जब वे खुद लंबी ड्राइव पर जाते है, तो यह टेंशन उन्हे भी होती है. लेकिन इसे दूर करने के लिए आपको एक जिम्मेदार ड्राइवर बनना होगा. ओवर स्पीडिंग या रफ ड्राइविंग करेंगे तो बैटरी जल्दी खत्म होगी.

आजकल टाटा, जियो और स्टैटिक जैसी कंपनिया अपना नेटवर्क तेजी से फैला रही है. कार के साथ मिलने वाला एप आपको बता देता है कि अगला स्टेशन किधर है. जहा पहले गाड़ियां तीन घंटे मे चार्ज होती थी, अब फास्ट चार्जर से 30 से 90 मिनट मे चार्ज हो जाती है. बस आपको अपनी यात्रा की थोड़ी प्लानिंग करनी होगी.

ब्रांड ट्रस्ट: कौन-सी ईवी खरीदे?

आजकल टीवीएस (TVS iQube), होंडा और एथर (Ather) जैसी कंपनियो के स्कूटर खूब बिक रहे है. वही कुछ नए ब्रांड भी है जो 300 से 400 किलोमीटर रेंज का दावा करते है. इस पर एक्सपर्ट का कहना है कि यह उपभोक्ता के व्यवहार पर निर्भर करता है. लोग जाने-माने और भरोसेमंद ब्रांड पर पैसा लगाना ज्यादा पसंद करते है. सुवासित अपना एक किस्सा बताते है कि जब वे अपनी हुंडई की कार खरीदने पटना के शोरूम मे गए, तो शोरूम वाले ने कहा कि सर, यह यहां की सिर्फ दूसरी गाड़ी है जो बिक रही है, आप इसे क्यों खरीद रहे है? लेकिन एक्सपर्ट का अपना पैरामीटर था, उनके लिए उस सेगमेंट मे उससे बेहतर कोई कार नहीं थी. अगर आप बड़ी कंपनियो की कार लेते है, तो वो ग्लोबल स्टैंडर्ड पर बनी होती है और कंपनी लाइफटाइम वारंटी भी दे रही है.

हाइब्रिड और ईवी का ही है भविष्य 

ईवी चलाना बहुत किफायती है, खासकर भारतीय मिडिल क्लास के लिए. अगर आप अब भी प्योर ईवी लेने से हिचक रहे है, तो हाइब्रिड (Hybrid) या प्लग-इन हाइब्रिड (PHEV) एक बहुत बढ़िया ऑप्शन है. डीजल गाड़ियों के भविष्य को लेकर जो डर है, उसे देखते हुए हाइब्रिड एक शानदार ऑप्शन बनकर उभरा है. समय के साथ ईवी हमारे लाइफस्टाइल का हिस्सा बन जाएगी. इसलिए इससे डरने की बजाय इसके फायदो को समझे.

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लेखक के बारे में

By शिवांश शेखर

शॉर्ट बायो 

शिवांश शेखर ऑटोमोबाइल और खेल स्पेशलिस्ट हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. ऑटो सेक्शन में कार/बाइक लॉन्च, फीचर्स, खासियत, टिप्स, कंपेरिजन और सपेक्स से संबंधित खबरें कवर करते हैं.

विस्तृत बायो 

शिवांश शेखर ऑटोमोबाइल और खेल स्पेशलिस्ट पत्रकार हैं, जो पिछले 3 वर्षों से डिजिटल मीडिया में ऑटो और खेल जगत से जुड़ी खबरों के बारे में लगातार लिखते हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. ऑटो सेक्शन में उनकी रूचि कार/बाइक लॉन्च, फीचर्स, स्पेसिफिकेशन, टिप्स, ट्रिक्स और कंपेरिजन से जुड़े विषयों में है. इसके अलावा फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलॉजी और ऑटो इंडस्ट्रीज के बदलते ट्रेंड्स पर लगातार लिखते हैं. 

उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को सिर्फ लॉन्च, कीमत और फीचर्स के बारे में ही न बताया जाए, बल्कि यह भी जानकारी दी जाए कि वह तकनीक आम लोगों के लिए कितने काम का है, उसे इस्तेमाल करने का अनुभव कैसा रहेगा और उसे खरीदना सही रहेगा या नहीं.

पढ़ाई  

बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में जन्में शिवांश शेखर की शुरुआती शिक्षा (BSEB) से पूरी हुई. इसके बाद उन्होंने साल 2023 में चौधरी चरण सिंह यूनीवर्सिटी, मेरठ (CCSU) के अंतर्गत आने वाली इंसटीच्युट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, नोएडा (IMS) से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. पढ़ाई के दौरान ही शिवांश की रुचि खेल और ऑटो के विषयों पर लिखने में बढ़ने लगी. इसी दौरान उन्होंने खेल और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों पर काम करना शुरू किया और आगे चलकर इन्हीं विषयों को अपने काम का हिस्सा बना लिया. 

काम का सफर 

पत्रकारिता का ककहरा सीखने के बाद शिवांश का सफर एपीएन न्यूज से शुरू हुआ था. उन्होंने पत्रकारिता का समूह जागरण न्यू मीडिया में बतौर सब एडिटर खेल और अन्य खबरों की तकनीकी समझ विकसित की. जेएनएम में करीब डेढ़ साल खेल और अन्य विषयों पर काम करने के बाद उन्होंने एसियानेट न्यूज की तरफ रुख अपनाया. वहां, करीब डेढ़ साल तक ऑटोमोबाइल और स्पोर्ट्स सेक्शन में काम किया और फिर प्रभात खबर का रुख किया, जहां ऑटो बीट पर काम कर रहे हैं. ट्रेंड्स को लगातार फॉलो करते हैं.

विजन 

शिवांश का मानना है कि ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरें केवल नई गाड़ियों के बारे में जानकारी नहीं देती, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, खरीदारों के फैसलों और डिजिटल एक्सपिरियंस पर भी असर डालती हैं.

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