Trump Iran Exit Plan: रॉयटर्स और कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सेना की परेशानी बढ़ा दी है. हालत यह है कि अमेरिका को अपने कई बेस खाली करने पड़े हैं. अब अमेरिकी सैनिक और सपोर्ट स्टाफ बड़े बेस छोड़कर होटलों, ऑफिस बिल्डिंग्स और अस्थायी ठिकानों से काम करने को मजबूर हैं. तेहरान का दावा है कि उसने अमेरिकी बेस को रहने लायक नहीं छोड़ा है, जिससे वाशिंगटन का पूरा मिलिट्री ढांचा गड़बड़ा गया है.
ट्रंप बोले- ईरान का न्यूक्लियर सपना खत्म
बुधवार (31 मार्च) को रॉयटर्स से बातचीत में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया कि अमेरिका अब ईरान से बहुत जल्दी बाहर निकल जाएगा. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका का मुख्य लक्ष्य ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने से रोकना था, जो अब पूरा हो चुका है क्योंकि ईरान अब ऐसा करने के लायक नहीं बचा है. उन्होंने कहा कि मैं जाऊंगा और सबको साथ ले जाऊंगा, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो हम ‘स्पॉट हिट’ (जरूरत के हिसाब से सटीक हमले) के लिए वापस आ सकते हैं.
पुराने मिलिट्री बेस अब अमेरिका के लिए बने सिरदर्द
दशकों से अमेरिका ने कतर, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई में बड़े और हाई-टेक बेस बना रखे थे. सैन्य जानकारों का कहना है कि इन ठिकानों की लोकेशन सबको पता है, इसलिए ये ईरान के बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के लिए आसान टारगेट बन गए हैं. ईरान का मकसद इन बेस को पूरी तरह तबाह करना नहीं, बल्कि इन्हें इतना नुकसान पहुँचाना है कि यहाँ से ऑपरेशन चलाना महंगा और मुश्किल हो जाए. रनवे, रडार और फ्यूल सिस्टम पर बार-बार होने वाले हमलों से सेना की तैयारी पर बुरा असर पड़ रहा है.
एक जगह रहने के बजाय टुकड़ियों में बंटी सेना
ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका अब ‘डिस्पर्स्ड ऑपरेशंस’ यानी बिखराव वाली रणनीति अपना रहा है. इसमें फौज और हथियारों को एक बड़े बेस पर रखने के बजाय कई अलग-अलग जगहों पर फैला दिया गया है. इससे दुश्मन के लिए निशाना लगाना मुश्किल हो जाता है, लेकिन होटलों या कामचलाऊ जगहों से युद्ध जैसे हालात संभालना काफी चुनौतीपूर्ण है. इससे लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा का तालमेल बैठाने में दिक्कत आ रही है.
सस्ता ड्रोन और महंगा डिफेंस: ईरान का ‘लो कॉस्ट’ वॉर प्लान
इस संघर्ष में पैसे का गणित भी अहम है. ईरान सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से हमला करता है, जबकि अमेरिका को उन्हें रोकने के लिए ‘पैट्रियट’ या ‘थाड’ जैसे करोड़ों रुपये के महंगे डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करने पड़ते हैं. बार-बार होने वाले इन हमलों से अमेरिका के रक्षा उपकरण और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है. अब यह लड़ाई सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि इस बात की है कि कौन सा देश लंबे समय तक दबाव झेल सकता है.
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NATO पर भड़के ट्रंप
राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले ट्रंप ने नाटो (NATO) देशों पर भी निशाना साधा. उन्होंने ईरान मामले में सहयोग न मिलने पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वह अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. ट्रंप के इस बयान से यूरोपीय सहयोगियों के बीच हलचल बढ़ गई है, क्योंकि वे नाटो को सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी मानते हैं. फिलहाल, ट्रंप का संदेश साफ है कि वह अमेरिका को किसी लंबी जंग में नहीं फंसाना चाहते.
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