प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की विदेश नीति को देखें तो एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा है कि भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता को केवल पारंपरिक पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रखा. मध्य एशिया यानी Central Asia भारत की व्यापक यूरेशियाई रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है.
कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान—ये पांच देश सिर्फ तेल, गैस और यूरेनियम के कारण महत्वपूर्ण नहीं हैं. इनके जरिए भारत की नजर ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी, आतंकवाद-रोधी सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों, डिजिटल टेक्नोलॉजी और यूरेशियाई रणनीतिक संतुलन पर भी है.
और यहीं से कहानी दिलचस्प होती है.
आखिर Central Asia भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
मध्य एशिया यूरोप, रूस, चीन, दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र है
इस क्षेत्र के पास तेल, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिज संसाधन हैं. साथ ही यह क्षेत्र उन व्यापारिक और परिवहन गलियारों के बीच स्थित है, जो एशिया को यूरोप से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
भारत के लिए चुनौती यह है कि इन पांचों देशों में से कोई भी भारत से सीधे स्थलीय सीमा साझा नहीं करता.
यानी भारत के लिए Central Asia तक पहुंच केवल कूटनीति का सवाल नहीं है. यह कनेक्टिविटी की भी चुनौती है.
इसीलिए चाबहार बंदरगाह और International North-South Transport Corridor यानी INSTC भारत की रणनीति में महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
2015 में मोदी ने बदला Central Asia का कूटनीतिक गणित
भारत का Central Asia से संबंध नया नहीं है.
सिल्क रूट के दौर में भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापार के साथ-साथ विचारों, धर्म, संस्कृति और ज्ञान का भी आदान-प्रदान हुआ. बौद्ध धर्म के प्रसार से लेकर सूफी परंपराओं तक दोनों क्षेत्रों के बीच ऐतिहासिक संपर्क रहा है.
लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने भारत की आर्थिक पहुंच को सीमित कर दिया.
फिर आया जुलाई 2015.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ही यात्रा में उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान—पांचों Central Asian देशों का दौरा किया. विदेश मंत्रालय ने इसे भारत के Central Asian partners के साथ जुड़ाव में महत्वपूर्ण गति देने वाली यात्रा के रूप में दर्ज किया है.
यह सिर्फ पांच देशों की यात्रा नहीं थी.
इसका संदेश था—Central Asia भारत की विदेश नीति के peripheral map पर नहीं, strategic map पर है.
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4C से आगे बढ़ी भारत की Central Asia Policy
2012 में भारत ने Connect Central Asia Policy के जरिए इस क्षेत्र के साथ संबंधों को पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी.
इसका जोर broadly चार क्षेत्रों पर था—
- Commerce
- Connectivity
- Consular cooperation
- Culture
लेकिन समस्या थी—connectivity
भारत और Central Asia के बीच पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जटिल भू-राजनीति मौजूद थी. इसलिए भारत को वैकल्पिक रास्तों की जरूरत थी.
यहीं से Chabahar Port और INSTC का महत्व बढ़ता है.
मोदी सरकार ने रिश्तों को संस्थागत कैसे बनाया?
2019 में India-Central Asia Dialogue की शुरुआत हुई. इसका उद्देश्य राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक, विकास और सांस्कृतिक सहयोग को संस्थागत रूप देना था.
इसके बाद 27 जनवरी 2022 को पहला India-Central Asia Summit हुआ, जिसकी मेजबानी प्रधानमंत्री मोदी ने वर्चुअल प्रारूप में की. पांचों Central Asian देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें शामिल हुए.
2025 में चौथे India-Central Asia Dialogue के दौरान भारत और पांचों देशों ने व्यापार, डिजिटल भुगतान, वित्तीय संपर्क, pharmaceuticals, IT, agriculture, energy और INSTC जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया.
यानी भारत की नीति अब केवल high-level visits तक सीमित नहीं है.
यह धीरे-धीरे institutional engagement में बदल रही है.
रूस और चीन के बीच भारत की जगह कहां है?
Central Asia की राजनीति को समझने के लिए तीन शक्तियों को देखना जरूरी है—
रूस, चीन और भारत.
रूस के Central Asia के साथ ऐतिहासिक सुरक्षा, सैन्य और आर्थिक संबंध हैं.
वहीं चीन ने Belt and Road Initiative के जरिए क्षेत्र में बड़े पैमाने पर infrastructure, trade और energy connectivity विकसित की है.
भारत के पास चीन जैसी विशाल infrastructure financing capacity या रूस जैसी पारंपरिक security architecture नहीं है.
फिर भारत की रणनीति क्या है?
एक अलग विकल्प.
भारत का जोर मुख्यतः—
- Human resource development
- Education
- Pharmaceuticals
- Digital Public Infrastructure
- Technology
- Capacity building
- Defence cooperation
- Energy security
- Connectivity
पर है.
यानी भारत Central Asia में रूस या चीन को हटाने की रणनीति के बजाय अपने लिए strategic space बनाने की कोशिश करता दिखता है.
2026 में मोदी का Uzbekistan दौरा क्यों महत्वपूर्ण रहा?
यह रणनीति अगस्त 2026 में और स्पष्ट दिखाई दी.
29-30 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान की राजकीय यात्रा की. इस दौरान भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने संबंधों को Comprehensive Strategic Partnership के स्तर तक बढ़ाया. दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा.
इसके साथ ही uranium की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए framework, critical minerals, infrastructure, AI, digital public infrastructure और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए.
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और critical minerals अब विदेश नीति के केंद्रीय मुद्दों में शामिल हो चुके हैं.
UPI से लेकर Uranium तक: कूटनीति का नया मॉडल
उज्बेकिस्तान यात्रा में एक दिलचस्प पहल Digital Public Infrastructure से जुड़ी थी.
भारत की NPCI International Payments Limited और उज्बेकिस्तान के National Interbank Processing Centre के बीच ऐसा commercial agreement हुआ, जिससे भारत के UPI apps के जरिए Uzbekistan के national QR—UZQR—पर merchant payments की सुविधा संभव होगी.
यानी Central Asia में भारत की पहुंच केवल राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं है.
एक तरफ UPI और digital infrastructure, दूसरी तरफ uranium और critical minerals.
यह भारत की विदेश नीति में technology और strategic resources के बढ़ते संबंध को दिखाता है.
मोदी को मिला Uzbekistan का सर्वोच्च विदेशी सम्मान
30 अगस्त 2026 को उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘Oliy Darajali Do‘stlik’ Order से सम्मानित किया.
यह उज्बेकिस्तान का विदेशी नेताओं के लिए सर्वोच्च सम्मान है. प्रधानमंत्री मोदी ने यह सम्मान भारत और उज्बेकिस्तान के दीर्घकालिक संबंधों को समर्पित किया.
इस यात्रा में दोनों देशों ने 11 समझौतों और पहलों के जरिए mining, tourism, education, health, agriculture और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए.
Uzbekistan के बाद Bishkek: SCO के जरिए बड़ा Eurasian मंच
उज्बेकिस्तान यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी Bishkek, Kyrgyz Republic पहुंचे, जहां 31 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक Shanghai Cooperation Organisation यानी SCO का 26वां Summit हुआ.
SCO के इस शिखर सम्मेलन में मोदी ने भारत की पहले से व्यक्त की गई Security, Connectivity और Opportunity की दृष्टि पर जोर दिया.
यही वह बिंदु है जहां Central Asia bilateral diplomacy से निकलकर broader Eurasian diplomacy का हिस्सा बन जाता है.
लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत की रणनीति के सामने सबसे बड़ी समस्या अभी भी geography है.
- Central Asia तक भारत की सीधी land connectivity नहीं है.
- इसलिए Chabahar और INSTC जैसे routes बेहद महत्वपूर्ण हैं.
- दूसरी चुनौती Afghanistan है.
- अफगानिस्तान में अस्थिरता या सुरक्षा संबंधी जोखिम South Asia और Central Asia के बीच connectivity को प्रभावित कर सकते हैं.
- तीसरी चुनौती है—China की आर्थिक उपस्थिति और Russia की पारंपरिक security influence.
- इसलिए Central Asia में भारत की रणनीति किसी त्वरित breakthrough की कहानी नहीं है.
यह long game है.
West की नजर से भारत की चुनौती
Turan Research Center के Director Joseph Epstein के आकलन के अनुसार, भारत का वैश्विक कद बढ़ा है, लेकिन Central Asia में ठोस और dominant presence बनाना अभी भी कठिन है.
उनके अनुसार Russia की security presence और China का economic footprint क्षेत्र में गहरा है. भारत की भौगोलिक सीमाएं भी उसकी operational reach को प्रभावित करती हैं.
लेकिन Epstein यह भी रेखांकित करते हैं कि भारत के पास soft power, education, digital public infrastructure और cultural links जैसे ऐसे माध्यम हैं, जिनके जरिए Central Asian देशों के साथ संबंधों को diversify किया जा सकता है.
यही भारत की संभावित strategic niche है.
असली सवाल: क्या Central Asia भारत का नया strategic frontier है?
Central Asia में भारत की कहानी किसी एक summit, किसी एक port या किसी एक agreement की कहानी नहीं है.
यह तीन स्तरों पर चल रही है—
- पहला—Security: आतंकवाद, extremism, Afghanistan और regional stability.
- दूसरा—Connectivity: Chabahar, INSTC और नए transport corridors.
- तीसरा—Resources & Technology: Uranium, critical minerals, energy, pharmaceuticals, AI और Digital Public Infrastructure.
- और इसके ऊपर है एक चौथा layer—civilizational diplomacy
भारत Central Asia को केवल पांच देशों के समूह के रूप में नहीं देखता. यह भारत के लिए उस विशाल Eurasian space का हिस्सा है, जहां इतिहास, भूगोल, संसाधन और रणनीति एक-दूसरे से जुड़ते हैं.
मोदी की Central Asia policy का असली अर्थ
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर उनकी विदेश नीति को Central Asia के संदर्भ में देखें तो पिछले एक दशक की सबसे महत्वपूर्ण बात institutionalisation दिखाई देती है.
2015 में पांचों देशों की यात्रा से शुरू हुआ high-level outreach आगे चलकर India-Central Asia Dialogue और 2022 Summit तक पहुंचा. 2026 में Uzbekistan के साथ Comprehensive Strategic Partnership और Bishkek SCO Summit ने इस engagement को एक और व्यापक Eurasian context दिया.
लेकिन Central Asia में भारत की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है.
भूगोल, Afghanistan, connectivity और China-Russia की गहरी मौजूदगी इसे एक लंबी रणनीतिक प्रक्रिया बनाते हैं.
इसलिए Central Asia में भारत की नीति को किसी तात्कालिक geopolitical contest की बजाय एक long-term strategic investment के रूप में देखना अधिक उपयोगी है.
भारत का लक्ष्य केवल वहां मौजूद होना नहीं है—बल्कि Eurasia में ऐसा strategic space बनाना है, जहां connectivity, technology, resources और diplomacy के जरिए New Delhi की स्वतंत्र भूमिका बनी रहे.
लेखिका: Samantha Karmakar, Foreign Policy Analyst, Diplomacy & Strategic Affairs
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