Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग में पाकिस्तान का नाम अचानक चर्चा में आ गया है. इसके पीछे एक बड़ा ‘लेन-देन’ छिपा है. पिछले साल जब भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वजह से पाकिस्तान की हालत खराब थी, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की मदद की थी. अब उसी अहसान को चुकाने के लिए पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराने में अपनी पूरी ताकत लगा दी. इसे ‘बैक टू बैक’ मदद के तौर पर देखा जा रहा है.
ट्रंप के करीबी कैसे बने शाहबाज शरीफ?
कुछ समय पहले तक अमेरिका पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता था, लेकिन पहलगाम हमले के बाद भारत के साथ हुए तीन दिन के संघर्ष ने सब बदल दिया. फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप की खूब तारीफ की. पाकिस्तान ने भारत के साथ युद्ध रुकवाने का पूरा क्रेडिट ट्रंप को दिया और उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी आगे बढ़ाया. इतना ही नहीं, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने 50 से ज्यादा बार ट्रंप टीम से संपर्क किया था ताकि भारत को रोका जा सके.
ईरान युद्ध में ट्रंप को क्यों पड़ी पाकिस्तान की जरूरत?
8 अप्रैल 2026 तक हालात पूरी तरह बदल गए. ईरान के साथ युद्ध खींचता देख ट्रंप परेशान थे क्योंकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमले किए थे. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप को एक ऐसे रास्ते की तलाश थी जिससे वे इस युद्ध से बाहर निकल सकें. इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान को चुना क्योंकि पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और वहां की सरकार से उनके पुराने रिश्ते हैं. ट्रंप का मानना था कि अगर कोई मुस्लिम देश सुलह का प्रस्ताव देगा, तो ईरान उसे जल्दी मान लेगा.
पाकिस्तान बना महज एक ‘मैसेंजर’
भले ही पाकिस्तान खुद को एक बड़ा मध्यस्थ (मीडिएशन) दिखा रहा हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी. द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और आईएसआई चीफ आसिम मलिक ने बैकचैनल से बातचीत की. इसी बीच शाहबाज शरीफ से सोशल मीडिया पोस्ट में एक बड़ी चूक हो गई. उनके पोस्ट में ‘ड्राफ्ट’ शब्द लिखा रह गया, जिससे यह साफ हो गया कि पाकिस्तान की पोस्ट भी व्हाइट हाउस से मंजूर होकर आई थी. न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पाकिस्तान की हर बात पर अमेरिका की नजर थी.
चीन की मदद से हुई फाइनल डील
पाकिस्तान ने इस मामले में अपने दोस्त चीन की भी मदद ली. फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने पिछले हफ्ते चीन का दौरा किया ताकि ईरान को बातचीत की मेज पर लाया जा सके. अंत में चीन के दबाव के कारण ही ईरान युद्ध रोकने के लिए तैयार हुआ. खुद ट्रंप ने भी माना कि ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने में चीन का बड़ा रोल रहा है. इस पूरी प्रक्रिया से ट्रंप को अपनी गिरती इमेज सुधारने का मौका मिल गया और पाकिस्तान को एक बड़ी डिप्लोमैटिक जीत मिल गई.
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क्या था असली खेल?
साफ है कि यह सब एक ‘क्विड प्रो कुओ’ यानी बराबरी का सौदा था. मई 2025 में जब भारत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को तबाह कर रहा था, तब पाकिस्तान ने अमेरिका से मदद मांगी थी. अब एक साल बाद जब अमेरिका ईरान के मोर्चे पर फंसा, तो पाकिस्तान ने उसे बाहर निकलने का रास्ता दिया. इस तरह ट्रंप ने पाकिस्तान की मदद की और पाकिस्तान ने ईरान युद्ध में अमेरिका का काम आसान कर दिया.
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