मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच के होर्मुज को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. ईरान ने एक बार फिर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की बात दोहराई है. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, दूसरी ओर, ईरान समर्थित हूती विद्रोही भी लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों के लिए शुल्क लगाने की तैयारी में है. इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं.
सदियों पुराना है समुद्री रास्तों का विवाद
समुद्री मार्गों पर अधिकार का विवाद नया नहीं है. साल 1493 में पोप अलेक्जेंडर षष्ठम ने स्पेन और पुर्तगाल के बीच समुद्री क्षेत्रों को बांटने के लिए अटलांटिक महासागर में एक काल्पनिक रेखा खींची थी. बाद में 1494 की टॉर्डेसिलास संधि में इस रेखा को और पश्चिम की ओर खिसका दिया गया. इसके बावजूद समुद्री सीमाओं और रास्तों को लेकर विवाद कभी खत्म नहीं हुए.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ओमान ने खाड़ी के अन्य देशों के समर्थन से एक प्रस्ताव ईरान के सामने रखा है. इस योजना के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संयुक्त प्रबंधन किया जाएगा और जहाजों से स्वैच्छिक शुल्क लिया जाएगा. हालांकि अमेरिका ने साफ कहा है कि होर्मुज एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और किसी भी देश को वहां टोल या नियंत्रण का अधिकार नहीं दिया जा सकता.
कैसे बने आधुनिक समुद्री कानून?
17वीं और 18वीं शताब्दी में तटीय देशों ने अपने समुद्री क्षेत्रों पर अधिकार जताना शुरू किया. शुरुआत में यह सीमा तट पर लगी तोपों की मारक क्षमता तक मानी जाती थी, जिसे बाद में तीन समुद्री मील का नियम कहा गया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई देशों ने अपनी समुद्री सीमाएं 12 समुद्री मील और कुछ ने 200 समुद्री मील तक बढ़ाने का दावा कर दिया.
संयुक्त राष्ट्र ने बनाया वैश्विक नियम
साल 1960 के दशक में समुद्र के भीतर तेल उत्पादन, परमाणु पनडुब्बियों की गतिविधियों और बढ़ते समुद्री व्यापार ने नए नियमों की जरूरत पैदा की. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने 1973 में समुद्री कानून पर सम्मेलन शुरू किया और 1982 में संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) को अपनाया गया. इस समझौते ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों के आवागमन और देशों के अधिकारों के लिए वैश्विक ढांचा तैयार किया.
ईरान और अमेरिका की अलग-अलग स्थिति
दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने 1982 में UNCLOS पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन उसे कभी मंजूरी नहीं दी. वहीं अमेरिका ने भी इस संधि की पुष्टि नहीं की, हालांकि वह इसके अधिकांश नौवहन संबंधी नियमों का व्यवहार में पालन करता है. ऐसे में होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक जलमार्गों पर नियंत्रण को लेकर विवाद आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार के लिए बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
