Iran Attack US Military Bases: कुवैत के कैंप ब्यूहरिंग में अमेरिकी सैनिकों का खाड़ी क्षेत्र में सबसे बड़ा सैन्य केंद्र था. वहां का कभी चहल-पहल से भरा अमेरिकी माइक्रो-सिटी था. लेकिन अब वह लगभग खाली और बुरी तरह तबाह हो चुका है. यह नुकसान कई हफ्तों तक चले ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण हुआ. ईरान ने केवल कुवैत ही नहीं, खाड़ी क्षेत्र के विभिन्न देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बेहिसाब नुकसान पहुंचाया है.
कुवैत उन कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों में से एक था, जिन्हें ऑयल रिच अरब प्रायद्वीप में ईरान ने निशाना बनाया. अमेरिकी मीडिया सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के हमलों में आठ देशों में फैले कम से कम 16 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा. यह क्षेत्र में अमेरिका की अधिकांश सैन्य मौजूदगी को प्रभावित करता है. इनमें से कुछ ठिकाने अब लगभग इस्तेमाल के लायक नहीं बचे हैं. ईरान के हमले उस समय हुए, जब अमेरिका और इजरायल ईरान की रक्षा क्षमताओं पर हमले कर रहे थे.
ईरान ने किस-किस चीज को बनाया निशाना?
सीएनएन को इन हमलों की जांच में अभूतपूर्व तबाही के स्पष्ट सबूत मिले हैं. एक अमेरिकी सूत्र ने सीएनएन को बताया कि उन्होंने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ऐसा नुकसान पहले कभी नहीं देखा. उनके अनुसार, ये हमले तेज, सटीक और उन्नत तकनीक के जरिए किए गए थे. ईरान के प्रमुख निशानों में मल्टी-मिलियन डॉलर के विमान भी शामिल थे, जैसे बोइंग ई-3 सेंट्री. यह खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका को बड़ी निगरानी क्षमता प्रदान करता था. यह विमान अब उत्पादन में नहीं है और इसकी कीमत करीब 500 मिलियन डॉलर बताई जाती है.
ईरान ने महत्वपूर्ण संचार उपकरणों को भी निशाना बनाया, खासतौर पर गोल्फ बॉल जैसे दिखने वाले बड़े ढांचे, जिन्हें रैडोम कहा जाता है. ये उपग्रह डिश की सुरक्षा करते हैं, जो डेटा ट्रांसमिशन के लिए बेहद जरूरी होते हैं. इस क्षेत्र में, युद्ध शुरू होने के एक महीने के भीतर ईरान ने लगभग सभी रैडोम नष्ट कर दिए, सिर्फ एक को छोड़कर.
अमेरिकी रडार सिस्टम भी ईरान के निशाने पर रहे
सबसे अहम बात यह रही कि ईरान ने रडार सिस्टम को निशाना बनाया. ये बेहद उन्नत, महंगे और बदलने में मुश्किल होते हैं. यह एयर डिफेंस के लिए अत्यंत जरूरी हैं. नुकसान के आकलन से जुड़े एक अमेरिकी संसदीय सहयोगी ने इन्हें सबसे किफायती लक्ष्य बताया. उनके शब्दों में- हमारे रडार सिस्टम हमारे सबसे व्यापक (बड़े) और सबसे सीमित संसाधन हैं.
अमेरिकी बेस पर ईरान के हमलों ने तोड़ा भ्रम
यह मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए यह स्थिति एक दुविधा पैदा करती है. एक ओर, ईरान की ताकत का प्रदर्शन खाड़ी की सुरक्षा के लिए अमेरिकी मौजूदगी को और जरूरी बनाता है. लेकिन दूसरी ओर, अब एक नई वास्तविकता सामने आई है. पहले जिन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अभेद्य किले माना जाता था, वे अब आसान निशाना बनते दिख रहे हैं.
सऊदी अरब के एक सूत्र ने सीएनएन से कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका के सबसे पुराने अरब सहयोगी सऊदी अरब को यह दिखा दिया है कि अमेरिका के साथ गठबंधन न तो एकमात्र विकल्प है और न ही अटूट. यानी सुरक्षा के लिए और भी विकल्प हैं और सुरक्षा न प्रदान कर पाने की स्थिति में अमेरिका के साथ रिश्ता टूट भी सकता है.
अमेरिकी ठिकानों की बढ़ती असुरक्षा का अंदाजा कतर के अल-उदैद एयरबेस के वॉर रूम से लगाया जा सकता है. यह 21 देशों में अमेरिकी वायु शक्ति के संचालन का मुख्य कमांड सेंटर है, जिसे एक बार नहीं बल्कि दो बार निशाना बनाया गया, जिससे भारी नुकसान हुआ. हालांकि उस समय तक बेस को काफी हद तक खाली करा लिया गया था और कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि ईरान अपने लक्ष्यों पर कितनी सटीक नजर रख सकता है.
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ईरान को चीन से मिला सहयोग
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में तेहरान ने गुप्त रूप से चीन का TEE-01B उपग्रह हासिल किया, जो उसके पुराने उपग्रहों की तुलना में एक बड़ा अपग्रेड है. इससे ईरान को कम गुणवत्ता वाली तस्वीरों से आगे बढ़कर हाई-रिजॉल्यूशन इमेजरी प्राप्त होने लगी, जो लगभग अमेरिका जैसी ही स्पष्टता देती है. यह पहली बार है जब अमेरिका ऐसे प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है, जिसके पास इतनी उन्नत सैटेलाइट निगरानी क्षमता है.
नुकसान झेलने के बाद अमेरिका अब भी तैयार
इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के एक अधिकारी ने कहा कि रक्षा विभाग नुकसान के आकलन पर टिप्पणी नहीं करता, लेकिन अमेरिकी सेना अब भी पूरी तरह सक्रिय है और उसकी युद्धक क्षमता तथा तैयारियां पहले जैसी ही हैं. हालांकि, वास्तविक स्थिति यह है कि मध्य पूर्व में तैनात अधिकांश अमेरिकी सैनिकों को उनके ठिकानों से हटा लिया गया है. अब उनमें से कई सैनिक अरब प्रायद्वीप में होटलों और अपार्टमेंट्स जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थानों से काम कर रहे हैं.
