वाशिंगटन : अमेरिका की सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी तीन लोगों के डीएनए से आनुवंशिक रूप से बेहतर इनसानी भ्रूण बनाने की तकनीक पर विचार कर रही है. भ्रूण को कृत्रिम रूप से बनाये जाने के फायदों की बात के साथ कई नैतिक सवाल भी खड़े हो रहे हैं.
यह तकनीक अब तक बंदरों पर टेस्ट की गयी थी, इससे मिले नतीजों के आधार पर इस हफ्ते अमेरिका में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) यह तय करेगा कि इस तरह के परीक्षण मनुष्य पर किये जाने की छूट दी जानी चाहिए या नहीं. इस तकनीक से डिजाइनर बच्चे के जन्म में मदद मिल सकती है. पैदा हुए बच्चे में मां से अनचाहे गुण या जेनेटिक बीमारियां न पहुंचें इसके लिए उन्हें बदला जा सकता है.
इस तकनीक के आ जाने से माता- पिता बच्चे की आंख का रंग, कद या बुद्धिमत्ता भी तय करने की कोशिश कर सकते हैं. यह जीन मॉडिफिकेशन के बजाय जीन करेक्शन में काम आयेगी. डॉक्टर शूखरात मितालिपोव कहते हैं, हम उन जींस को इस तकनीक से ठीक कर सकते हैं, जो किसी कारण परिवर्तित हो गये और जो मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं.
* कैसे काम करेगी तकनीक
अमेरिका में हर साल पांच हजार में से एक बच्चा माइटोकॉन्ड्रिया में मौजूद दोषपूर्ण डीएनए के कारण इस तरह के रोगों के साथ पैदा होता है. माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए बच्चे में मां से आता है, पिता से नहीं. इस तकनीक के जरिये मां के सेल के वे ही डीएनए बच्चे में डाले जायेंगे जो न्यूक्लियस में होंगे न कि माइटोकॉन्ड्रिया के डीएनए. माइटेकॉन्ड्रियल डीएनए डोनर मां के होंगे.
इसे अंजाम देने के लिए रिसर्चर एक स्वस्थ डोनर महिला के अंडाणु के न्यूक्लियस डीएनए निकाल कर मां के न्यूक्लियस डीएनए से बदल देते हैं. प्रजनन पर भ्रूण में मां के न्यूक्लियस डीएनए जायेंगे, जो आंखों का रंग और कद जैसी खूबियां निर्धारित करते हैं, लेकिन माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए डोनर मां का होगा. इस तकनीक से बच्चे के गुणों में हुए परिवर्तन आनेवाली नस्लों में आगे बढ़ते जायेंगे.
