भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर में अमेरिका जाने वाले हैं. प्रधानमंत्री के इस दौरे के दौरान भारतीय प्रशासन इस कोशिश में है कि वह अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने के लिए अपनी दावेदारी को मजबूती के साथ रखे. इन मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि इन जटिल मामलों में निर्णय एक रात में ही नहीं किये जाते हैंऔर तब जबकि भारत सरकार ने खुद को इन मामलों में अलग-थलग रखा है.
परमाणु दायित्व के वैश्विक समूह के कानूनी सलाहकार ओमर ब्राउन ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में कहा कि भारत की दावेदारी पर मोदी के दौरे के दौरान बातचीत होगी. लेकिन अमेरिकी कॉरपोरेशन के लिए यह खतरे की बात होगी कि वह परमाणु दुर्घटना के खतरे को देखते हुए भारत की दावेदारी पर अभी विचार करे.
उन्होंने कहा कि भारत के परमाणु दायित्व कानून की धारा 17(बी) और अनुच्छेद 46 के अनुसार अभी सिर्फ इस मुद्दे पर बहस की जा सकती है, लेकिन भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल करने के लिए यह जरूरी है कि कानून में संशोधन किया जाये. परमाणु दायित्व के कानून के संबंध में अटकलें तब से लगायीं जा रही हैं, जब से अमेरिका की स्टेट डिपार्टमेंट की अस्टिेंट सेक्रेटरी दक्षिण और मध्य एशिया के दौरे पर थीं.
