मनोज सिंह
manoj.singh@prabhatkhabar.in
रांची : विश्व स्वास्थ्य संगठन की अपील पर विश्व में 10 अक्तूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाया जाता है. इस वर्ष की थीम है कार्यालयों में बढ़ता तनाव. यह समस्या पूरे विश्व की समस्या हो गयी है. हाल ही में एक खबर आयी कि जापान की एक जर्नलिस्ट की मौत अधिक काम के दबाव में हो गयी.
भारत में भी जवानों द्वारा काम के दबाव में आकर खुद को या किसी अन्य को गोली मार देने के कई मामले सामने आये हैं. कई लोगों ने काम का दबाव न झेलकर नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया है. निजी और सरकारी कार्यालयों में काम करते हुए दूसरे काम शुरू कर दिये. विशेषज्ञ मानते हैं कि काम और तनाव दोनों का आपसी संबध है. इसके बीच तालमेल की जरूरत होती है. काम के तनाव को ऑफिस में छोड़कर आयें. घर को घर रहने दें. अच्छे तालमेल से ही जीवन को सुगम और सौम्य बनाया जा सकता है.
क्या कहता है विश्व स्वास्थ्य संगठन
काम करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, लेकिन काम का नकारात्मक माहौल खराब
डिप्रेशन और तनाव से आर्थिक नुकसान भी होता है. पूरे विश्व में करीब एक ट्रिलियन यूएस डॉलर के नुकसान का अनुमान
कर्मियों को परेशान करने की समस्या सामान्य है
केस-1
पद के साथ बढ़ा काम, अब मानसिक रोग के शिकार
झारखंड सरकार के स्वास्थ्य विभाग में काम करनेवाले एक डॉक्टर का इलाज शहर के एक मनोचिकित्सक के पास चल रहा है. मनोचिकित्सक बताते हैं कि सरकारी नौकरी में रहने के दौरान परिवार के साथ रहने का मौका कम मिल पाता है. अभी राजधानी के एक सटे जिले में पदस्थापित हैं. 10 साल से बाहर हैं. पढ़ाई के कारण बच्चों को राजधानी में रखना पड़ता है. पदोन्नति के बाद काम का लोड बढ़ गया है.
अब महीनों घर नहीं आ पाते हैं. स्थिति है कि एक दिन गाड़ी चलाते-चलाते चक्कर आ गया. खुद से दवा खा लिया. कुछ दिनों के बाद सिर में दर्द और मानसिक तनाव रहने लगा. चूंकि डॉक्टर हैं इस कारण किसी मनोचिकित्सालय में इलाज नहीं कराया. एक परिचित साथी से इलाज करा रहे हैं. नियमित रूप से डिप्रेशन की दवा ले रहे हैं.
केस-2
नौकरियां छोड़ी, अब तनाव में हैं
एक फार्मास्यूटिकल कंपनी में काम करनेवाले एक रिप्रजेंटेटिव का पूरा परिवार बिहार में रहता है. यहां अच्छी कंपनी में मेडिकल रिप्रजेंटेटिव था. पत्नी और बच्चा के साथ एक किराये का घर भी ले लिया. पैसे कम पड़ने लगे. इधर कंपनी का टारगेट पूरा करने का तनाव रहता था.
घर पर ध्यान नहीं रहता. टारगेट पूरा नहीं होने के कारण एक कंपनी छोड़ दूसरी में चला जाता. कई बार ऐसा करना के बाद भी उसकी परेशानी कम नहीं हुई. घर में गुस्सा में रहने लगा. व्यवहार बदल गया. पत्नी मनोचिकित्सक के पास ले गयी. वहां उसका इलाज चल रहा है. साइकोथेरेपी भी हो रही है.
झारखंड में 11.1% लोगों में मानसिक रोग के लक्षण
भारत सरकार ने पहली बार कुछ राज्यों में मेंटल हेल्थ सर्वे कराया है. इसकी पहली रिपोर्ट जारी की गयी है. इसके अनुसार झारखंड में 11.1 फीसदी लोगों में मानसिक रोग के लक्षण हैं. करीब 0.76 फीसदी लोगों में यह समस्या काफी गंभीर है. 10.81 फीसदी लोगों में सामान्य रूप से मानसिक रोग के लक्षण पाये गये हैं. इसमें 3.4 फीसदी में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पायी गयी है. 12 फीसदी लोग नशे का प्रयोग करते हैं. करीब एक फीसदी लोग बौद्धिक रूप से मनोविकार के शिकार हैं.
12 फीसदी नशा करने वालों में से 20 फीसदी में तंबाकू खाने संबंधी मानसिक परेशानी है. 4.6 फीसदी करीब अलकोहल के कारण तथा करीब 0.6 फीसदी अन्य नशे का प्रयोग कर मानसिक रूप से बीमार हुए हैं. 13 से 17 साल वाले में सबसे अधिक करीब 13.5 फीसदी मनोरोग के लक्षण वाले अरबन मेट्रो के हैं. 30 से 39 साल के करीब तीन फीसदी महिला और इतनी ही मात्रा में पुरुष मूड डिसआॅर्डर के शिकार पाये गये हैं. 40 से 48 साल की चार फीसदी से अधिक महिलाएं स्ट्रेस की शिकार हैं.
इस वर्ष की थीम है कार्यालयों में बढ़ता तनाव
ये हैं काम के दौरान तनाव के रिस्क फैक्टर
उचित स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की नीति का अभाव
प्रबंधन का कर्मियों के साथ कम बातचीत
निर्णय लेनेवाले कार्य में कम से कम शामिल करना
कर्मियों का सहयोग कम होना
काम का समय तय नहीं होना
प्रबंधन का अस्पष्ट उद्देश्य
डब्ल्यूएचओ की बचाव की अनुशंसा
मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए काम से संबंधित रिस्क फैक्टर को कम करना
काम के सकारात्मक पहलू को विकसित करना
समय-समय पर तनाव दूर करने की पहल
कार्यस्थल पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाना
बीच-बीच में कर्मियों को मोटिवेट करना
किसी दूसरी कंपनी में की गयी कार्रवाई का जिक्र नहीं करें
एक-एक कर्मी की उपयोगिता तय करना, उनकी जरूरतों को समझने की कोशिश करना
कर्मियों के हितों के लिए अच्छी नीति विकसित करना
परेशानी के समय जहां से सहायता मिल सकती है, वहां की जानकारी समय-समय पर उपलब्ध कराना
कर्मियों के स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था करना
कर्मियों को निर्णय लेनेवाले कार्यों में शामिल करना
कर्मियों के करियर को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए समय-समय पर काम करना
करीब 75 फीसदी लोगों का इलाज अब भी नहीं
रिपोर्ट के अनुसार करीब 74.52 फीसदी लोग अाज भी इलाज नहीं करा पा रहे हैं. 48 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिनकी बीमारी की अवधि एक से लेकर 240 दिनों तक की है. करीब चार फीसदी ऐसे हैं जिनकी बीमारी की अवधि एक से लेकर 120 दिनों तक है.
काम को तनाव के रूप में न लें
रिनपास के डॉ सिद्धार्थ सिन्हा का कहना है कि काम करना जरूरी है. काम नहीं रहने पर भी मानसिक परेशानी होती है. काम रहने पर भी मानसिक परेशानी होती है. दोनों के बीच बेहतर तालमेल करना जरूरी है. काम को तनाव के रूप में नहीं लेना चाहिए. काम के तनाव को ऑफिस में छोड़कर आयें. घर को घर रहने दें. तभी मनुष्य स्वस्थ रह सकता है. कोई ऐसा नहीं कह सकता है कि काम नहीं करें. काम करेंगे, तो तनाव होगा ही. इससे बचा नहीं जा सकता है. सिर्फ जरूरत बेहतर तालमेल की होती है.
सीआइपी में परिचर्चा आज, राज्यपाल लेंगी हिस्सा
केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीअाइपी) में वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा है. इसमें राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू भी हिस्सा लेंगी. इसी दिन सीआइपी की वेबसाइट लांच होगी. डाक टिकट भी जारी किया जायेगा.
इससे पूर्व दोपहर दो बजे से जाने-माने मनोचिकित्सक व मनोवैज्ञानिक डब्ल्यूएचओ की इस साल की थीम: मेंटल हेल्थ इन वर्क प्लेस विषय पर चर्चा करेंगे. इसमें सीआइपी के निदेशक डॉ डी राम, पूर्व शिक्षक डॉ विनोद कुमार सिन्हा, डॉ सीआरजे खेस, डॉ बी दास, रिनपास के डॉ जय प्रकाश, सीअाइपी के डॉ संजय कुमार मुंडा होंगे. कार्यक्रम का संचालन डॉ वरुण एस मेहता करेंगे.
