सरहुल : धरती और सूर्य की शादी का उत्सव, सरना मां के चरणों में नयी सब्जियां अर्पित कर की गयी पूजा, आज होगा उपवास

Sarhul festival of jharkhand : केंद्रीय आदिवासी सेना के अध्यक्ष शिवा कच्छप ने प्रकृति महापर्व सरहुल की पूजा अर्चना सादगी से की. सरना मां का चरणों में नयी सब्जियां अर्पित की और पूरे देश के लोगों के लिए प्रार्थना की कि लोग कोरोना वायरस की चपेट मे न आयें. सब कुछ कुशल मंगल रहे. उन्होंने लोगों से कहा कि लॉकडाउन का सख्ती से पलान करें. खुद सुरक्षित रहें और दूसरों को भी सुरक्षित करें.

रांची : केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा है कि प्रकृति पर्व सरहुल आदिवासियों का सबसे बड़ा त्योहार है. चैत्र शुक्ल पक्ष में सरहुल पूजा के साथ आदिवासी नये साल के आगमन का उत्सव मनाते हैं. आदिवासी आदिकाल से प्रकृति के उपासक रहे हैं. जल, जंगल, जमीन, पहाड़, पर्वत, नदी नाले, धरती, सूरज, आकाश पाताल आदि की पूजा करते हैं. सरहुल को धरती और सूर्य के विवाह के रूप में मनाया जाता है. इस महीने धरती संपूर्ण प्राकृतिक शृंगार में होती है. पेड़ों में नये-नये पत्ते, फल फूल से पूरी धरती हरी भरी और मनमोहक हो जाती है.

उन्होंने बताया कि सरहुल पूजा में आदिवासी समाज के लोग घर-आंगन की साफ-सफाई करते हैं. घरों की लिपाई-पुताई होती है. दीवारों पर चित्र बनाते हैं. उपवास के दिन घर के पुरुष सदस्य जंगलों से सुखवा पत्ता और फूल लाते हैं. केकड़ा व मछली पकड़ते हैं. पूजा पाठ कर केकड़ा को घर के चूल्हे के पास टांग दिया जाता है. धान बुआई के समय केकड़ा को चूर्ण करके उड़द दाल, मडुआ आदि में मिश्रित कर खेत में डाला जाता है. इस तरह बुआई करने से फसल में वृद्धि होती है. सरहुल में आदिवासी अपने पूर्वजों को याद कर उन्हें सबसे पहले नये फल फूल, जैसे उड़द दाल, कटहल, डहु, फुटकल आदि सात या नौ प्रकार की सब्जी चढ़ाते हैं. उसके बाद ही परिवार के लोग अन्न ग्रहण करते हैं. गांव के पहान सरना स्थल में सुखवा के पेड़ के समक्ष पूजा पाठ कर रंगुवा, चरका, लुपुंग मुर्गे की बलि देकर गांव की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. पहान द्वारा सरना स्थलों में दो घड़े में पानी रखकर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है. पूजा के बाद गांव मौजा के लोग सामूहिक रूप से ढोल, नगाड़े, मांदर बजाकर नाचते गाते और उत्सव मनाते हैं.

सादगी से की सरहुल की पूजा नयी सब्जियां अर्पित की : केंद्रीय आदिवासी सेना के अध्यक्ष शिवा कच्छप ने प्रकृति महापर्व सरहुल की पूजा अर्चना सादगी से की. सरना मां का चरणों में नयी सब्जियां अर्पित की और पूरे देश के लोगों के लिए प्रार्थना की कि लोग कोरोना वायरस की चपेट मे न आयें. सब कुछ कुशल मंगल रहे. उन्होंने लोगों से कहा कि लॉकडाउन का सख्ती से पलान करें. खुद सुरक्षित रहें और दूसरों को भी सुरक्षित करें.

सफेद झंडे को पुनर्स्थापित करने की जरूरत : झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव, उप सचिव बिरसा भगत व संरक्षक जयमंत्री उरांव ने कहा है कि हमें अपने पूर्वजों का इतिहास और पहचान को नहीं भूलना चाहिए. उरांव समाज को रोहतासगढ़ का इतिहास नहीं भूलना चाहिए. सफेद झंडा हमारे पूर्वजों की देन है, जो शांति और शुद्धता का प्रतीक है. इसे लोग भूलते जा रहे हैं. हम इसे फिर से सरना स्थलों में, अपने-अपने घरों में स्थापित कर पुनर्स्थापित कर रहे हैं. रांची के पश्चिमी क्षेत्र गुमला, लोहरदगा आदि जगहों के पुराने इलाकों के पूजा स्थलों में और घरों में सफेद झंडा ही पाया जाता है. यह समिति शुरू से अपने पूर्वजों की पूजा पद्धति, परंपरा, संस्कार और संस्कृति की रक्षा और सुरक्षा की बात करती है.

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Author: Rajneesh Anand

Published by: Prabhat Khabar

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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