Pocso Act में मौत की सजा, जुर्माना भी संभव, दिल्ली पुलिस की चार्टशीट के बाद बृजभूषण सिंह को मिल सकती है राहत

दिल्ली पुलिस ने नाबालिग पहलवान द्वारा बृजभूषण सिंह के खिलाफ दर्ज कराये गये मामले को रद्द करने की अदालत से सिफारिश की इसकी वजह यह है कि उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं.

भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आज दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दिया. चूंकि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज कराया गया था, इसलिए पुलिस ने दो चार्जशीट दाखिल किया. अबतक जो जानकारी सामने आयी है, उसके अनुसार दिल्ली पुलिस ने नाबालिग पहलवान द्वारा बृजभूषण सिंह के खिलाफ दर्ज कराये गये मामले को रद्द करने की अदालत से सिफारिश की इसकी वजह यह है कि उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं. यह सिफारिश बृजभूषण शरण सिंह के लिए राहत भरी है, क्योंकि पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज होने से उनकी परेशानी बहुत बढ़ गयी थी. आखिर पॉक्सो एक्ट में सी क्या बात है और किस अपराध में यह एक्ट लगाया जाता है? आइए जानते हैं.

क्या है पाॅक्सो एक्ट

पॉक्सो यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट. इस कानून को 2012 में लागू किया गया था. ये कानून बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की रोकथाम के लिए बनाया गया है. इस एक्ट के तहत 18 साल के कम उम्र के बच्चे और बच्चियों को शामिल किया गया है, इस एक्ट के तहत नाबालिगों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में कठोर दंड का प्रावधान किया गया है. इस एक्ट का उद्देश्य एक बच्चे को किसी भी प्रकार के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण और उपेक्षा से बचाना है.

पहचान उजागर करना भी अपराध

इस एक्ट के तहत यह व्यवस्था की गयी है कि अगर कोई बच्चा या बच्ची यौन शोषण के शिकार होते हैं तो पूरी न्याय प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों के साथ संवेदनशील तरीके से व्यवहार किया जायेगा और उनकी देखभाल की जायेगी. न्याय प्रक्रिया को पारदर्शी और न्यायपूर्ण होना चाहिए ताकि बच्चे के साथ किसी भी तरह का भेदभाव ना हो पाये. साथ ही बच्चे को सुरक्षा का अधिकार भी दिया जाये, ताकि उसके साथ दोबारा कोई दुर्घटना ना हो. इस एक्ट में यह प्रावधान भी किया गया है कि बच्चे को निजता अधिकार प्राप्त हो. उसकी पहचान किसी भी हालत में उजागर ना की जाये. इसके साथ ही बच्चे को मुआवजे का अधिकार भी प्राप्त है.

क्या हैं सजा के प्रावधान

-पोक्सो एक्ट के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी नाबालिग के साथ पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का दोषी पाया जाता है तो उसे 10 से 20 साल की जेल हो सकती है. साथ ही उसे उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और भारी जुर्माना भी भरना पड़ सकता है.

-पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असाॅल्ट के दौरान अगर बच्चे या बच्ची की मौत हो जाती है, तो अत्यधिक कठोर सजा का प्रावधान है जिसके तहत 20 साल तक की सजा या फिर आजीवन कारावास या फिर मौत की सजा का भी प्रावधान है.

-इसी तरह अगर कोई व्यक्ति बच्चे का इस्तेमाल पाॅर्नोग्राफी के लिए करता है, तो भी सजा के प्रावधान पांच से सात साल के हैं.

-बच्चे का अश्लील वीडियो रखने उसे प्रसारित करने जैसे अपराधों के लिए भी पाॅक्सो एक्ट के तहत सजा का प्रावधान है जो अपराध के नेचर के अनुसार तीस से सात साल तक की हो सकती है.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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