एक समय था जब भारतीय स्मार्टफोन बाजार में माइक्रोमैक्स, लावा, कार्बन, इंटेक्स, सेल्कॉन और जोलो जैसे नाम हर मोबाइल दुकान पर दिखाई देते थे. कम कीमत और स्थानीय पहचान के दम पर इन ब्रांड्स ने करोड़ों ग्राहकों तक पहुंच बनाई थी. लेकिन कुछ ही वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. आज बाजार में श्याओमी, वीवो, ओप्पो, रियलमी, सैमसंग और ऐपल जैसे विदेशी ब्रांड्स का दबदबा है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जिन भारतीय कंपनियों ने कभी बाजार पर राज किया, वे अचानक पीछे कैसे छूट गईं?
सस्ते नहीं, बेहतर फोन लेकर आए विदेशी ब्रांड
भारतीय ब्रांड्स की सबसे बड़ी चुनौती तब शुरू हुई जब चीनी स्मार्टफोन कंपनियों ने भारतीय बाजार में आक्रामक रणनीति के साथ एंट्री की. इन कंपनियों ने कम कीमत में बेहतर प्रॉसेसर, बड़ी बैटरी, आकर्षक डिजाइन और एडवांस कैमरा फीचर्स वाले स्मार्टफोन पेश किये. ग्राहक को एक जैसी कीमत में ज्यादा फीचर्स मिलने लगे, जिससे उनकी पसंद तेजी से बदल गई.
जहां कई भारतीय कंपनियां पुराने हार्डवेयर और सीमित फीचर्स वाले मॉडल बेच रही थीं, वहीं विदेशी ब्रांड लगातार नये इनोवेशन ला रहे थे. यही अंतर धीरे-धीरे बाजार हिस्सेदारी में दिखाई देने लगा.
रिसर्च और टेक्नोलॉजी में रह गए पीछे
स्मार्टफोन इंडस्ट्री में सफलता सिर्फ फोन बेचने से नहीं, बल्कि तकनीक विकसित करने से मिलती है. अधिकांश भारतीय ब्रांड्स तैयार डिजाइन और हार्डवेयर को अपने नाम से बेचते थे. दूसरी ओर विदेशी कंपनियां कैमरा टेक्नोलॉजी, प्रॉसेसर ऑप्टिमाइजेशन, डिस्प्ले और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट पर भारी निवेश कर रही थीं.
नतीजा यह हुआ कि भारतीय ब्रांड्स तकनीकी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते गए. ग्राहकों को बेहतर परफॉर्मेंस और अनुभव देने वाले ब्रांड्स तेजी से लोकप्रिय हो गए.
मार्केटिंग की लड़ाई में भी नहीं टिक पाए
स्मार्टफोन बाजार में सिर्फ अच्छा प्रॉडक्ट होना काफी नहीं होता. ब्रांड की पहचान बनाना भी उतना ही जरूरी है. वीवो, ओप्पो और अन्य कंपनियों ने क्रिकेट टूर्नामेंट, आईपीएल, सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट और बड़े विज्ञापन अभियानों पर अरबों रुपये खर्च किये.
भारतीय कंपनियों के पास इतना बड़ा मार्केटिंग बजट नहीं था. परिणामस्वरूप नये ग्राहकों का भरोसा धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स की तरफ बढ़ता गया और घरेलू कंपनियां दृश्यता की दौड़ में पीछे रह गईं.
4G क्रांति ने बदल दिया पूरा खेल
भारत में जियो के आने के बाद 4G स्मार्टफोन की मांग में अचानक विस्फोट हुआ. यह वह दौर था जब बाजार तेजी से बदल रहा था और कंपनियों को नई तकनीक के अनुरूप खुद को ढालना था.
कई भारतीय ब्रांड्स इस बदलाव की रफ्तार को समय पर नहीं पकड़ सके. जब तक उन्होंने नये 4G डिवाइस बाजार में उतारे, तब तक विदेशी कंपनियां मजबूत नेटवर्क, बेहतर डिवाइस और आक्रामक कीमतों के साथ बाजार पर कब्जा जमा चुकी थीं.
आफ्टर-सेल्स सर्विस और अपडेट बने निर्णायक फैक्टर
स्मार्टफोन खरीदने के बाद ग्राहकों के लिए सर्विस सेंटर, सॉफ्टवेयर अपडेट और वारंटी सपोर्ट भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. विदेशी कंपनियों ने देशभर में मजबूत सर्विस नेटवर्क तैयार किया और नियमित अपडेट देकर ग्राहकों का भरोसा जीता.
इसके मुकाबले कई भारतीय ब्रांड्स सर्विस और सपोर्ट के मोर्चे पर कमजोर साबित हुए. इससे ग्राहक अनुभव प्रभावित हुआ और लोगों ने धीरे-धीरे दूसरे विकल्पों को चुनना शुरू कर दिया.
क्या फिर लौट सकते हैं भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड?
भारतीय ब्रांड्स की कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. लावा समेत कुछ घरेलू कंपनियां एक बार फिर बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं. सरकार की पीएलआई योजना और “मेक इन इंडिया” अभियान ने भी स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया है.
हालांकि आज सफलता सिर्फ फोन असेंबल करने से नहीं मिलेगी. भारतीय कंपनियों को रिसर्च, सॉफ्टवेयर, चिप डिजाइन और इनोवेशन में भी निवेश बढ़ाना होगा. अगर वे वैश्विक स्तर के उत्पाद विकसित करने में सफल रहती हैं, तो भविष्य में एक नयी वापसी संभव है.
बदलते बाजार ने बदली तस्वीर
भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड्स की गिरावट सिर्फ कीमत की वजह से नहीं हुई. तकनीक, मार्केटिंग, रिसर्च, सर्विस और बदलती ग्राहक अपेक्षाओं ने मिलकर बाजार की दिशा बदल दी. आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई भारतीय ब्रांड फिर से उस मुकाम तक पहुंच पाता है, जहां कभी उसकी मजबूत पकड़ हुआ करती थी.
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