पत्रकार बनना चाहते थे, पिता ने बनाया इंजीनियर, फिर Adobe को बदलकर रख दिया... ऐसी है CEO शंतनु नारायण की कहानी

प्रभात खबर की इस खास सीरीज ‘टेक टाइकून्स की कहानी’ में आज हम जानेंगे Adobe के CEO शंतनु नारायण के बारे में. पत्रकार बनने का सपना देखने वाले शंतनु नारायण ने माता-पिता की सलाह पर इंजीनियरिंग पढ़ी और अमेरिका पहुंचकर टेक्नोलॉजी की दुनिया में कदम रखा. 1998 में Adobe से जुड़ने के बाद उन्होंने कंपनी को क्लाउड और सब्सक्रिप्शन मॉडल की ओर बढ़ाया और करीब 18 साल CEO रहे.

Adobe का नाम सुनते ही Photoshop, Acrobat और कई दूसरे क्रिएटिव सॉफ्टवेयर याद आते हैं. लेकिन इस बड़ी टेक कंपनी को लंबे समय तक संभालने वाले शख्स की कहानी किसी टेक्नोलॉजी के साथ नहीं, बल्कि एक अलग सपने से शुरू हुई थी. शंतनु नारायण बचपन में इंजीनियर नहीं, बल्कि पत्रकार बनना चाहते थे. उनके माता-पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग पढ़ें और आखिरकार उन्होंने वही किया. आगे चलकर यही शख्स Adobe का CEO बना और कंपनी के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव लेकर आया.

‘टेक टाइकून्स की कहानी’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं शंतनु नारायण के बारे में, उनके बचपन से लेकर Adobe के CEO बनने तक के सफर में छिपे उन किस्सों के बारे में, जिन्हें शायद बहुत कम लोग जानते हैं.

पढ़ाई और आजादी, ऐसे हुई शंतनु की परवरिश

शंतनु नारायण का जन्म 27 मई 1963 को हैदराबाद में हुआ. उनका बचपन ऐसे परिवार में बीता, जहां पढ़ाई को बहुत महत्व दिया जाता था. उनकी मां अमेरिकन लिटरेचर पढ़ाती थीं, जबकि पिता अपना बिजनेस चलाते थे. शंतनु ने खुद कई इंटरव्यू में बताया है कि उनके घर में बच्चों को अपनी जिज्ञासा के हिसाब से अलग-अलग चीजें आजमाने की आजादी थी. उनके पिता ने अमेरिका में पढ़ाई की थी और बाद में भारत लौटकर अपना बिजनेस शुरू किया.

इंजीनियर नहीं, पत्रकार बनना चाहते थे

शंतनु की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यही है. जिस व्यक्ति ने आगे चलकर दुनिया की बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों में से एक की कमान संभाली, वे कभी पत्रकार बनने का सपना देखते थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह इंजीनियर बनें, लेकिन उनका मन पत्रकारिता में था. स्कूल के दिनों में वह स्कूल की इन-हाउस मैगजीन Eagle के एडिटर भी रहे थे. यानी लिखने और खबरों में उनकी दिलचस्पी काफी पहले से थी.

पढ़ाई को नौकरी नहीं, सीखने का जरिया मानता था परिवार

शंतनु के पिता ने 1950 के दशक में अमेरिका जाकर पढ़ाई की थी. उस समय भारत से अमेरिका जाकर पढ़ना आज जितना नॉर्मल नहीं था. बाद में उन्होंने अपना बिजनेस शुरू किया और परिवार को शिक्षा के महत्व के बारे में लगातार इंस्पायर्ड किया. शंतनु ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके घर में शिक्षा को सिर्फ नौकरी पाने का जरिया नहीं माना जाता था. 

उनके माता-पिता बच्चों को अपनी बौद्धिक जिज्ञासा को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते थे. उनके मुताबिक, माता-पिता ने उन्हें यह सोच दी कि जिंदगी में असली सीमाएं कई बार बाहर की नहीं, बल्कि इंसान खुद अपने लिए बनाता है.

Osmania University से शुरू हुआ टेक का सफर

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद शंतनु ने हैदराबाद की Osmania University से Electronics Engineering की पढ़ाई की. इसके बाद वह अमेरिका चले गए और Bowling Green State University से Computer Science में मास्टर्स किया.

यह बदलाव भी आसान नहीं था. खुद शंतनु ने बताया है कि Ohio (अमेरिका के मिडवेस्टर्न इलाके में स्थित एक राज्य) में पढ़ाई के दौरान उन्हें पहली बार घर से दूर रहकर अपने रोजमर्रा के काम खुद करने पड़े. खाना बनाना, सफाई करना और पढ़ाई के साथ नए देश और नई संस्कृति में खुद को ढालना, उनके लिए बिल्कुल नया एक्सपीरियंस था.

लेकिन Ohio उनके लिए सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं बना. यहीं उनकी मुलाकात Reni Narayen से हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं. शंतनु ने एक इंटरव्यू में कहा कि Ohio की उनकी यादों में पत्नी से मुलाकात सबसे खास यादों में से एक है. इसके बाद उन्होंने University of California, Berkeley से MBA भी किया.

Apple में नौकरी मिली, लेकिन दिमाग में था अपना बिजनेस

पढ़ाई पूरी करने के बाद शंतनु ने टेक इंडस्ट्री में काम शुरू किया. उन्होंने Silicon Graphics और Apple जैसी कंपनियों में प्रोडक्ट डेवलपमेंट से जुड़े पदों पर काम किया. Adobe की आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक, वह 1998 में Adobe से जुड़े, लेकिन उससे पहले ही वह टेक इंडस्ट्री में अच्छा एक्सपीरियंस  हासिल कर चुके थे.

लेकिन शंतनु सिर्फ नौकरी करने वाले व्यक्ति नहीं थे. 1990 के दशक में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ Pictra नाम की कंपनी शुरू की. आज फोटो शेयर करना बेहद नॉर्मल बात है. लेकिन उस समय इंटरनेट पर फोटो शेयर करना कोई आम चीज नहीं थी. Pictra का आइडिया ही डिजिटल तस्वीरों को इंटरनेट के जरिए शेयर करने से जुड़ा था. यहीं शंतनु की जिंदगी का एक बड़ा सबक छिपा है.

जिस स्टार्टअप को उन्होंने शुरू किया, वही फेल हो गया

Pictra का आइडिया अपने समय से काफी आगे था. शंतनु ने Stanford Graduate School of Business के एक इंटरव्यू में बताया कि उस समय एनालॉग फोटोग्राफी से डिजिटल फोटोग्राफी की तरफ बदलाव शुरू ही हुआ था. उन्हें लगा कि लोग अपनी तस्वीरें और वीडियो दूसरों के साथ शेयर करना चाहेंगे. आइडिया सही था, लेकिन बिजनेस मॉडल तैयार नहीं था.

कंपनी ने निवेशकों से पैसा भी जुटाया. लेकिन शंतनु को बाद में लगा कि जिस तरीके से कंपनी कमाई करेगी, वह मॉडल काम नहीं कर रहा है. उन्होंने अपने को-फाउंडर से पैसा वापस करने की बात तक कही. आखिरकार Pictra की टेक्नोलॉजी Fuji को बेच दी गई.

शंतनु के लिए यह असफलता जरूर थी, लेकिन उन्होंने इसे अपने करियर का बड़ा सबक माना. उन्होंने कहा कि Pictra से मिली सीख उनके लिए बेहद जरूरी रही. शंतनु ने बाद में कहा कि वह Pictra को असफलता के रूप में देखने के बजाय अपने लिए बेहद अहम एक्सपीरियंस मानते हैं.

जिस कंपनी ने Pictra को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई, वहीं पहुंच गए

Pictra की कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ यहीं आता है. Adobe ने भी कभी Pictra को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी, हालांकि बाद में यह सौदा नहीं हुआ. इसके बाद शंतनु ने सोचा कि अगर वह Adobe के साथ काम करें तो उन्हें एक बड़ी कंपनी के साथ काम करने और कुछ बड़ा सीखने का मौका मिलेगा. आखिरकार 1998 में वह Adobe में शामिल हो गए. यह फैसला आगे चलकर उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ.

Adobe में तेजी से बढ़ती गई जिम्मेदारी

Adobe में शंतनु ने Vice President और General Manager के तौर पर शुरुआत की. इसके बाद वह अलग-अलग बड़ी जिम्मेदारियों तक पहुंचे.

  • 1998 में Adobe से जुड़े
  • 2005 में President और COO बने
  • 2007 में CEO बने
  • 2017 में कंपनी के Chairman बने.

यानी जिस कंपनी में वह नौकरी करने आए थे, कुछ ही वर्षों बाद उसी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके पास थी.

Adobe को डेस्कटॉप से क्लाउड तक ले जाने में बड़ी भूमिका

शंतनु के CEO बनने के समय टेक्नोलॉजी की दुनिया तेजी से बदल रही थी. Adobe का पुराना मॉडल मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर को डेस्कटॉप पर बेचने से जुड़ा था. शंतनु के नेतृत्व में कंपनी ने अपने क्रिएटिव प्रोडक्ट्स को क्लाउड-बेस्ड सब्सक्रिप्शन मॉडल की तरफ ले जाने पर बड़ा दांव लगाया.

यह बदलाव आसान नहीं था, क्योंकि कस्टमर्स को भी नए तरीके से सॉफ्टवेयर यूज करने की आदत डालनी थी. Adobe की आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक, शंतनु के नेतृत्व में कंपनी ने अपने क्रिएटिव सॉफ्टवेयर बिजनेस को क्लाउड-बेस्ड सब्सक्रिप्शन मॉडल में बदला और डिजिटल एक्सपीरियंस बिजनेस को भी तेजी से आगे बढ़ाया.

यही वजह है कि उनकी कहानी सिर्फ एक भारतीय के बड़ी विदेशी कंपनी का CEO बनने की कहानी नहीं है. यह उस इंसान की कहानी भी है जिसने अपने करियर में कई बार बदलती टेक्नोलॉजी के हिसाब से खुद को बदला.

आज भी रोज माता-पिता को फोन करते हैं

शंतनु की जिंदगी का एक छोटा लेकिन बेहद दिलचस्प किस्सा उनके एक इंटरव्यू में सामने आया. उन्होंने बताया कि वह दुनिया में कहीं भी हों, अपने दिन की शुरुआत अपने माता-पिता को फोन करके करते हैं. आज वीडियो कॉल की वजह से यह और आसान हो गया है. उन्होंने बताया कि वह इस आदत को लेकर काफी नियमित हैं और यह उन्हें उन लोगों की याद दिलाती है जिन्होंने उनकी जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर डाला.

18 साल बाद CEO पद से ट्रांजीशन का फैसला

शंतनु नारायण करीब 18 साल तक Adobe के CEO रहे. मार्च 2026 में Adobe ने घोषणा की कि वह नए CEO की नियुक्ति के बाद CEO पद से ट्रांजीशन करेंगे और इसके बाद चेयरमैन के रूप में कंपनी से जुड़े रहेंगे. कंपनी ने उनके कार्यकाल के दौरान Adobe के ट्रासंफॉर्मशन और AI के दौर के लिए कंपनी को तैयार करने में उनके योगदान का भी उल्लेख किया.

नोट: यह लेख प्रभात खबर की ‘टेक टायकून्स की कहानी’ सीरीज का हिस्सा है. इस सीरीज के जरिए हम टेक जगत की अलग-अलग दिग्गज हस्तियों की कहानी आपके सामने ला रहे हैं. जानेंगे कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की, किन चुनौतियों का सामना किया और किस तरह अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे. इस सीरीज की अगली कड़ी में हम 30 सितंबर को टेक इंडस्ट्री के एक और बड़े नाम की कहानी आपके सामने लेकर आएंगे. तब तक जुड़े रहिए हमारे साथ.

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लेखक के बारे में

By अंकित आनंद

शॉर्ट बायो

अंकित आनंद टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल जर्नलिस्ट हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. वे स्मार्टफोन, टेलीकॉम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कंज्यूमर टेक और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं.

काम के बारे में

अंकित आनंद एक टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल जर्नलिस्ट हैं, जो डिजिटल मीडिया में टेक और ऑटो सेक्टर से जुड़े विषयों पर लगातार लिखते हैं. वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. टेक्नोलॉजी सेक्टर में उनकी रुचि स्मार्टफोन लॉन्च, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, टेलीकॉम अपडेट्स, इंटरनेट सेवाओं, AI टूल्स, ऐप्स, गैजेट्स, टिप्स एंड ट्रिक्स और कंज्यूमर टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों में है. वहीं ऑटोमोबाइल सेक्टर में वे नई कारों और बाइक्स की लॉन्चिंग, फीचर्स, कीमत, सेफ्टी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी और ऑटो इंडस्ट्री के बदलते ट्रेंड्स पर रेगुलर लिखते हैं.

उनकी कोशिश रहती है कि हर खबर में सिर्फ फीचर्स, कीमत या लॉन्च की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी बताया जाए कि वह टेक्नोलॉजी आम लोगों के कितने काम की है, उसे इस्तेमाल करने का एक्सपीरियंस कैसा होगा और उसे खरीदना सही रहेगा या नहीं.

पढ़ाई और करियर

बिहार में जन्मे अंकित आनंद की शुरुआती शिक्षा सीबीएसई बोर्ड से हुई है. इसके बाद उन्होंने साल 2024 में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (GGSIPU) के कस्तूरी राम कॉलेज ऑफ हायर एजुकेशन से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन डिग्री हासिल की. पढ़ाई के दौरान ही अंकित की रुचि डिजिटल मीडिया और न्यूज लिखने में बढ़ने लगी. इसी दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों पर काम करना शुरू किया और आगे चलकर उन्होंने इन्हीं विषयों को अपने काम का हिस्सा बना लिया.

प्रभात खबर डिजिटल से पहले अंकित ने Zee News में करीब एक साल तक काम किया. यहां उन्होंने टीवी न्यूज प्रोडक्शन, आउटपुट डेस्क, कंटेंट रिसर्च, फैक्ट वेरिफिकेशन और न्यूज राइटिंग के अलग-अलग पहलुओं पर काम किया.

विजन

अंकित का मानना है कि टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरें केवल नए प्रोडक्ट्स की जानकारी नहीं होतीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, खरीदारी के फैसलों और डिजिटल एक्सपीरियंस पर भी असर डालती हैं.

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