अमेरिका में जन्म, लखनऊ में सीखी हिंदी, स्कूल में बनाया सॉफ्टवेयर, फिर ऐसे YouTube के CEO बने नील मोहन

प्रभात खबर की इस खास सीरीज ‘टेक टाइकून्स की कहानी’ में आज हम जानेंगे YouTube के CEO नील मोहन के बारे में. ये वही भारतीय मूल के टेक लीडर हैं, जिनका जन्म अमेरिका में हुआ, लेकिन हाईस्कूल से पहले परिवार के साथ लखनऊ आ गए. उस समय उन्हें हिंदी बोलना, पढ़ना और लिखना तक नहीं आता था. उन्होंने लखनऊ में पढ़ाई के दौरान हिंदी सीखी, हाईस्कूल में ही सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की और आगे चलकर Stanford University से पढ़ाई के बाद Google और YouTube तक का सफर तय किया.

आज YouTube दुनिया के सबसे बड़े वीडियो प्लेटफॉर्म में से एक है. करोड़ों लोग हर दिन इस प्लेटफॉर्म पर वीडियो देखते हैं और लाखों लोग इसी के जरिए अपना करियर बना रहे हैं. लेकिन इस पूरी दुनिया को संभालने वाले शख्स की कहानी थोड़ी अलग है. YouTube के CEO नील मोहन का जन्म अमेरिका में हुआ, बचपन का एक हिस्सा वहां बीता और फिर अचानक परिवार के साथ लखनऊ आ गए. उस समय नील को हिंदी बोलना तो दूर, पढ़ना-लिखना भी ठीक से नहीं आता था. नई जगह, नया स्कूल और बिल्कुल अलग माहौल. लेकिन शायद यही बदलाव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.

‘टेक टाइकून्स की कहानी’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं नील मोहन के बारे में, उनके बचपन से लेकर YouTube के CEO बनने तक के सफर में छिपे उन किस्सों के बारे में, जिन्हें शायद बहुत कम लोग जानते हैं. आइए जानते हैं.

पिता के पास अमेरिका जाने के लिए थे सिर्फ 25 डॉलर

नील मोहन की कहानी समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. उनके पिता IIT खड़गपुर से पढ़े थे और आगे PhD करने के लिए अमेरिका गए थे. नील मोहन ने Stanford Graduate School of Business के एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता जब अमेरिका पहुंचे, तब उनकी जेब में सिर्फ 25 डॉलर थे.

वह JFK (John F. Kennedy) एयरपोर्ट पर उतरे और वहां एक अनजान व्यक्ति से पूछा कि Lafayette, Indiana कैसे पहुंचा जा सकता है. उस व्यक्ति ने उन्हें Greyhound बस तक पहुंचने में मदद की. यही से उनके परिवार की अमेरिका वाली कहानी शुरू हुई.

नील का जन्म Indiana में हुआ और उनका बचपन ज्यादातर Michigan में Ann Arbor के पास बीता. उनके मुताबिक, बचपन काफी नॉर्मल था. वह Transformers, Star Wars और Baseball के शौकीन थे. उनके पूरे शहर में उस समय सिर्फ दो भारतीय परिवार थे. मजेदार बात यह थी कि दूसरे भारतीय परिवार के बच्चे का नाम भी नील ही था.

अमेरिका से लखनऊ पहुंचे तो हिंदी भी नहीं आती थी

नील की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब वह हाईस्कूल शुरू करने से ठीक पहले अपने परिवार के साथ भारत आ गए. आज जिस व्यक्ति की कंपनी पर पूरी दुनिया के लोग वीडियो देखते हैं, उस समय उसे भारत में अपनी ही भाषा से जूझना पड़ रहा था. नील ने खुद बताया है कि उन्हें हिंदी बोलना, पढ़ना और लिखना नहीं आता था. हां, माता-पिता को आपस में हिंदी बोलते सुनकर वह थोड़ी-बहुत समझ जरूर लेते थे.

लखनऊ आने के बाद उन्होंने St. Francis' College में पढ़ाई की. स्कूल में उनके शिक्षक उन्हें शांत, जिम्मेदार और पढ़ाई में तेज छात्र के तौर पर याद करते हैं.

उनकी टीचर निशि पांडेय के मुताबिक, Neal ज्यादा बोलते नहीं थे, लेकिन उनके अंदर कम उम्र में ही एक अलग तरह की गंभीरता दिखाई देती थी. वह Class IX के मॉनिटर भी रहे. शुरुआत में उनकी हिंदी थोड़ी अंग्रेजी जैसी लगती थी और कुछ बच्चे उन्हें इस बात पर चिढ़ाते भी थे. लेकिन नील ने इसे दिल पर लेने के बजाय मेहनत की और हिंदी सुधार ली.

किताबों और फिल्मों से बना कहानी सुनने का शौक

लखनऊ में रहने के दौरान नील ने सिर्फ हिंदी ही नहीं सीखी, बल्कि भारत को करीब से समझा. बाद में YouTube के CEO बनने के बाद उन्होंने बताया कि स्कूल के समय वह बहुत ज्यादा पढ़ते थे, फिल्में देखते थे और खबरों में भी उनकी काफी दिलचस्पी थी.

2024 में YouTube के Brandcast India कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि Lucknow आने के बाद उन्होंने पढ़ने, फिल्में देखने और खबरें जानने में काफी समय बिताया. इसी दौरान उन्हें स्टोरीटेलिंग यानी कहानी कहने की ताकत समझ में आई.

शायद यही वजह है कि आज जब वह YouTube की बात करते हैं, तो सिर्फ टेक्नोलॉजी की बात नहीं करते. वह क्रिएटर्स और उनकी कहानियों को भी उतनी ही अहमियत देते हैं.

हाई स्कूल में ही बना डाला था सॉफ्टवेयर

नील का टेक्नोलॉजी से रिश्ता YouTube से शुरू नहीं हुआ था. वह स्कूल के दिनों से ही टेक्नोलॉजी में दिलचस्पी रखते थे. Stanford के इंटरव्यू में नील मोहन ने खुद बताया कि हाईस्कूल में ही उन्होंने एक छोटा सा सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू किया था. यानी जब ज्यादातर बच्चे स्कूल, खेल और दोस्तों में व्यस्त रहते हैं, तब नील टेक्नोलॉजी से कुछ बनाने की कोशिश कर रहे थे.

इसके बाद उन्होंने Stanford University से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. 1996 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने टेक और इंटरनेट से जुड़ी कंपनियों में काम शुरू किया. बाद में Stanford से MBA भी किया और वहां Arjay Miller Scholar बने.

Google से पहले इंटरनेट की दुनिया में कर चुके थे बड़ा काम

नील ने अपने करियर की शुरुआत Accenture से की. इसके बाद वह NetGravity और DoubleClick जैसी कंपनियों से जुड़े. DoubleClick इंटरनेट पर ऐड्स दिखाने की टेक्नोलॉजी पर काम करती थी.

2007 में Google ने DoubleClick को करीब 3.1 अरब डॉलर में खरीदा. इस डील में नील की अहम भूमिका थी और DoubleClick के Google में शामिल होने के बाद वह भी Google का हिस्सा बन गए. यही वह दौर था, जब नील इंटरनेट की तेजी से बदलती दुनिया को बहुत करीब से देख रहे थे.

एक समय Google छोड़कर Twitter जाने वाले थे

नील के करियर का एक दिलचस्प मोड़ 2011 में आया. Twitter उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहता था. टाइम मैगजीन की खबर के मुताबिक, Google ने उन्हें रोकने के लिए करीब 100 मिलियन डॉलर के स्टॉक ग्रांट का पैकेज दिया था. नील ने आखिरकार Google के साथ बने रहने का फैसला किया. बाद में उन्होंने YouTube में बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं और 2023 में Susan Wojcicki के बाद YouTube के CEO बने.

नील की सबसे बड़ी सीख, बदलाव से मत भागो

नील की पूरी कहानी में एक चीज बार-बार नजर आती है, बदलाव. अमेरिका से भारत आना, नई भाषा सीखना, इंटरनेट के शुरुआती दौर में काम करना, ऐड्स टेक्नोलॉजी में जाना और फिर YouTube जैसे प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी संभालना, हर पड़ाव पर उन्हें कुछ नया सीखना पड़ा.

Stanford में उन्होंने कहा था कि लखनऊ आने का एक्सपीरियंस उनके लिए बहुत बड़ा झटका था, लेकिन इसी ने उन्हें जिंदगी में बदलाव को अपनाना सिखाया. वह इसे अपनी जिंदगी और करियर की सबसे अहम सीखों में से एक मानते हैं.

नोट: यह लेख प्रभात खबर की ‘टेक टायकून्स की कहानी’ सीरीज का हिस्सा है. इस सीरीज के जरिए हम टेक जगत की अलग-अलग दिग्गज हस्तियों की कहानी आपके सामने ला रहे हैं. जानेंगे कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की, किन चुनौतियों का सामना किया और किस तरह अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे. इस सीरीज की अगली कड़ी में हम 18 सितंबर को टेक इंडस्ट्री के एक और बड़े नाम की कहानी आपके सामने लेकर आएंगे. तब तक जुड़े रहिए हमारे साथ.

ये भी पढ़ें: गांव के स्कूल में फर्श पर बैठकर पढ़े, PhD को बताया अपनी असफलता और फिर खड़ी की Zoho, जानिए श्रीधर वेम्बू की कहानी

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By अंकित आनंद

शॉर्ट बायो

अंकित आनंद टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल जर्नलिस्ट हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. वे स्मार्टफोन, टेलीकॉम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कंज्यूमर टेक और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं.

काम के बारे में

अंकित आनंद एक टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल जर्नलिस्ट हैं, जो डिजिटल मीडिया में टेक और ऑटो सेक्टर से जुड़े विषयों पर लगातार लिखते हैं. वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. टेक्नोलॉजी सेक्टर में उनकी रुचि स्मार्टफोन लॉन्च, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, टेलीकॉम अपडेट्स, इंटरनेट सेवाओं, AI टूल्स, ऐप्स, गैजेट्स, टिप्स एंड ट्रिक्स और कंज्यूमर टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों में है. वहीं ऑटोमोबाइल सेक्टर में वे नई कारों और बाइक्स की लॉन्चिंग, फीचर्स, कीमत, सेफ्टी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी और ऑटो इंडस्ट्री के बदलते ट्रेंड्स पर रेगुलर लिखते हैं.

उनकी कोशिश रहती है कि हर खबर में सिर्फ फीचर्स, कीमत या लॉन्च की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी बताया जाए कि वह टेक्नोलॉजी आम लोगों के कितने काम की है, उसे इस्तेमाल करने का एक्सपीरियंस कैसा होगा और उसे खरीदना सही रहेगा या नहीं.

पढ़ाई और करियर

बिहार में जन्मे अंकित आनंद की शुरुआती शिक्षा सीबीएसई बोर्ड से हुई है. इसके बाद उन्होंने साल 2024 में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (GGSIPU) के कस्तूरी राम कॉलेज ऑफ हायर एजुकेशन से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन डिग्री हासिल की. पढ़ाई के दौरान ही अंकित की रुचि डिजिटल मीडिया और न्यूज लिखने में बढ़ने लगी. इसी दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों पर काम करना शुरू किया और आगे चलकर उन्होंने इन्हीं विषयों को अपने काम का हिस्सा बना लिया.

प्रभात खबर डिजिटल से पहले अंकित ने Zee News में करीब एक साल तक काम किया. यहां उन्होंने टीवी न्यूज प्रोडक्शन, आउटपुट डेस्क, कंटेंट रिसर्च, फैक्ट वेरिफिकेशन और न्यूज राइटिंग के अलग-अलग पहलुओं पर काम किया.

विजन

अंकित का मानना है कि टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरें केवल नए प्रोडक्ट्स की जानकारी नहीं होतीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, खरीदारी के फैसलों और डिजिटल एक्सपीरियंस पर भी असर डालती हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >