सिलीगुड़ी : ब्लड बैंक में रक्त कितना, बतायेगा कौन?

सिलीगुड़ी: सिलीगुड़ी जिला अस्पताल तथा वहां स्थित ब्लड बैंक को राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर चकाचक तो कर दिया, लेकिन ढांचागत सुविधाओं का विकास नहीं होने से रोगी तथा उनके परिजनों की समस्या जस की तस बनी हुई है. सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के भवन को यदि आप देखें, तो उसके सामने बड़े-बड़े निजी […]

सिलीगुड़ी: सिलीगुड़ी जिला अस्पताल तथा वहां स्थित ब्लड बैंक को राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर चकाचक तो कर दिया, लेकिन ढांचागत सुविधाओं का विकास नहीं होने से रोगी तथा उनके परिजनों की समस्या जस की तस बनी हुई है. सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के भवन को यदि आप देखें, तो उसके सामने बड़े-बड़े निजी अस्पताल फेल नजर आयेंगे.

दूसरी ओर मरीज और उनके परिजन लगातार बेहतर चिकित्सा सेवा उपलब्ध नहीं होने की शिकायत करते रहते हैं. ऐसे अस्पताल की कुछ समस्याएं बड़ी नहीं होतीं, लेकिन उसको तत्काल दुरुस्त नहीं कराने की वजह से समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है. बहरहाल आज हम यहां सिलीगुड़ी जिला अस्पताल परिसर स्थित ब्लड बैंक की बात कर रहे हैं.


यहां मरीजों तथा उनके परिजनों की सुविधा के लिए लगा डिस्पले बोर्ड अपने लगने के कुछ दिनों बाद से ही खराब है. उसके बाद भी अस्पताल प्रबंधन की ओर से इसको ठीक कराने की कोशिश नहीं की गयी. ऐसा नहीं है कि यह कोई बड़ी समस्या है. डिस्पले बोर्ड लगाने वाली कंपनी अथवा किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक कंपनी के इंजीनियरों को बुलाकर इसको ठीक कराया जा सकता है.जबकि इसकी कोशश नहीं की जा रही है. इस छोटी सी परेशानी के कारण जिला अस्पताल के इस ब्लड बैंक में कार्यरत कर्मचारियों तथा रोगियों के लिए रक्त के लिए आने वाले परिजनों के बीच किचकिच होती रहती है.

दरअसल ब्लड बैंकों के लिए राज्य स्वास्थ्य विभाग ने एक नया दिशा-निर्देश जारी किया है. उसके अनुसार हर ब्लड बैंक के सामने एक डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से विभिन्न ग्रुपों के रक्त का स्टॉक बताना होता है.दरअसल यह व्यवस्था रोगियों के आरोपों के बाद शुरु की गयी. रोगियों की शिकायत होती थी कि ब्लड बैंक में रक्त का स्टॉक होने के बाद भी मरीजों को दी नही जाती है. उसके बाद ही राज्य स्वास्थ्य विभाग ने रक्त के वर्तमान स्टॉक की जानकारी उपलब्ध कराने को निर्देश दिया .

पहले यह सुविधा मैनुअल थी. यानि एक बोर्ड में हर दिन रक्त के उपलब्ध स्टॉक को हाथ से लिखना पड़ता था. जमाना बदला और साथ में पुराना सिस्टम भी. हाथ से स्टॉक लिखने की व्यवस्था खत्म हो गयी. उसका स्थान इलेक्ट्रोनिक बोर्ड ने ले लिया.हजारों रूपये खर्च के यहां भी इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले बोर्ड तो लगा दिया गया,लेकिन यह सुचारू रूप से चालू रहे इसकी व्यवस्था नहीं की गयी. अब यह बोर्ड खराब पड़ा है. यहां तैनात एक कर्मचारी दीपक सरकार ने बताया कि इस इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले बोर्ड को चालू करना मुसिबत को दावत देने के समान है. इसमें दर्ज आंकड़ा अपने आप बदल जाता है .समस्या यह है कि यदि इसमें किसी ग्रुप के 10 युनिट रक्त उलब्ध होने की जानकारी दी जाती है तो बाद में अचानक वह आंकड़ा कभी 20 तो कुछ ही देर बाद 30 युनिट का हो जाता है. इसकी वजह से ही परेशानी होती है. कई बार तो निल स्टॉक को भी यह बोर्ड कई युनिट रक्त उपलब्ध बताता है. ऐसी परिस्थिति में कई बार रोगियों के परिजनों के साथ यहां मारामारी की स्थिति पैदा हो गयी है.इसी कारण से इस बोर्ड को चलाना बंद कर दिया गया. दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों ने इस बोर्ड को तत्काल ठीक कराने की मांग की है. यदि इसकी मरम्मती में देरी होती है तो मैनुअल सिस्टम शुरू करने की मांग ने भी जोर पकड़ लिया है. प्रमुख समाजिक कार्यकर्ता तथा वेस्ट बंगाल वोलेंटियरी ब्लड डोनर फोरम के सोमनाथ चटर्जी का कहना है कि राज्य सरकार ने लाखों रूपये खर्च कर चकाचक ब्लड बैंक तथा भब्य भवन तो बना दिया,परंतु मूलभूत सुविधाओं के विकास की अनदेखी की गयी.इस ब्लड बैंक में सबसे महत्वपूर्ण सेपेरेटर कंपोनेंट तक की व्यवस्था नहीं है.
क्या कहते हैं अस्पताल अधीक्षक
इस मामले में जब अस्पताल अधीक्षक अमिताभ मंडल से बात की गयी, तो उन्होंने माना कि इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड को बनाने में देरी हो रही है. दरअसल सिलीगुड़ी में इसकी मरम्मत करनेवाला कोई नहीं मिल रहा है. कोलकाता से इंजीनियरों को बुलाया जायेगा, तब इसकी मरम्मत हो सकेगी. डॉ मंडल ने कहा कि एक बार पहले भी इस बोर्ड की मरम्मत करायी गयी थी. बाद में यह फिर खराब हो गया.
डेंगू से स्थिति खतरनाक
श्री चटर्जी ने कहा कि सिलीगुड़ी शहर में डेंगू ने खतरनाक रूप धारण कर लिया है. कई मरीजों की मौत हो चुकी है और एक हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं. डेंगू मरीजों के लिए सबसे जरूरी प्लेटलेट्स है. ऐसी परिस्थिति में यहां ब्लड सेपरेटर कंपोनेंट की बेहद जरूरत है.श्री चटर्जी ने कि सिलीगुड़ी जिला अस्पताल में 360 बेड की व्यवस्था है. इसके लिए नियमानुसार साल में 3600 युनिट रक्त रखने की जरूरत है. इसका भी नियम है. एक बेड पर साल भर में 10 युनिट रक्त की जरूरत मानकर चलना पड़ता है.

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