विमल ने विनय व अनित को बताया धोखेबाज, कहा जनता मीर जाफरों को कभी नहीं करेगी माफ

दार्जिलिंग. गोरखालैंड आंदोलन के दौरान भूमिगत हो चुके गोजमुमो अध्यक्ष विमल गुरुंग ने एक और ऑडियें क्लिप जारी कर पार्टी समर्थकों और पहाड़वासियों को पार्टी के 11वें स्थापना दिवस पर शुभकामना संदेश में इस बार के दशैं व तीहार दीपावली में शामिल नहीं हो सकने का अफसोस जताते हुए उम्मीद जताई कि वह अगले साल […]

दार्जिलिंग. गोरखालैंड आंदोलन के दौरान भूमिगत हो चुके गोजमुमो अध्यक्ष विमल गुरुंग ने एक और ऑडियें क्लिप जारी कर पार्टी समर्थकों और पहाड़वासियों को पार्टी के 11वें स्थापना दिवस पर शुभकामना संदेश में इस बार के दशैं व तीहार दीपावली में शामिल नहीं हो सकने का अफसोस जताते हुए उम्मीद जताई कि वह अगले साल अपने लोगों के बीच अपनी भूमि पर त्योहार मना रहे होंगे.

साथ ही उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष पर हमला करने वालों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि मीर जाफरों से पार्टी समर्थकों को सावधान रहने की जरूरत है. जीटीए के कार्यवाहक चेयरमैन विनय तमांग और वाइस चेयरमैन अनित थापा को धोखेबाज बताकर उन्होंने कहा कि 105 दिनी हड़ताल का फैसला विनय तमांग का था, उनका नहीं. उनकी सहमति के बिना ही यह आंदोलन जल्दबाजी में शुरु किया गया.

जिससे आमजनों को काफी परेशानी उठानी पड़ी. गोजमुमो की स्थापना 7 अक्टूबर 2007 को की गई थी जिसका मकसद भारतीय गोरखाओं की उन्मुक्ति के लिये आगे बढ़ते हुए अलग राज्य गोरखालैंड के लिये संग्राम करना है. उन्होंने तमाम दुख कष्ट उठाकर भी गोरखालैंड की मुहिम को जारी रखा हुआ है. कहा कि अभी भी मैंने हिम्मत नहीं हारी है और लगातार विकट स्थितियों में भी संघर्षरत हूं. उन्होंने विनय व अनित का नाम लिये बिना आरोप लगाया कि कुछ लोग मोर्चा समर्थकों के घर में पुलिस भेजकर उन्हें डरा-धमकाकर सताने का काम कर रहे हैं.


राज्य सरकार ने भी उनकी सलाह लिये बिना ही विनय तमांग को जीटीए का केयरटेकर मनोनीत कर दिया. पहाड़ के हालिया बंद की पूरी जिम्मेदारी विनय तमांग पर डालते हुए विमल ने कहा कि उसके बावजूद उन्होंने हर दुख-तकलीफों को बर्दाश्त किया और आज भी कर रहे हैं. उन्होंने शुरु में बंद का विरोध किया था लेकिन विनय तमांग ने उनकी बात नहीं मानी. लेकिन जब भूख-प्यास के दौर के बावजूद आंदोलन सफलता की ओर अग्रसर था तभी इन दोनों ने आंदोलन के साथ दगा किया और राज्य सरकार से हाथ मिला लिया. ऐसे मीर जाफरों को पहाड़ की जनता कभी माफ नहीं करेगी. दिलीप घोष पर हमले के प्रसंग में कहा कि किसी भी नेता के विरोध में काला झंडा दिखाना और विरोध जताया जा सकता है लेकिन उन्हें शारीरिक रुप से प्रताड़ित करना कतई लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं कहा जा सकता है. यह एक तरह से गोरखाओं के माथे पर कलंक है.

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