सिलीगुड़ी: जीएनएलएफ के अध्यक्ष सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गठित दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद यानी दागोपाप के गठन में पहाड़ में करीब 18 माह का उग्र व सशस्त्र आंदोलन की अहम भूमिका रही. हालांकि इस खूनी संघर्ष में 1200 से अधिक लोगों की जानें चली गई. वहीं, माकपा के सदस्य और उनके हजारों समर्थक विस्थापित होकर सिलीगुड़ी में आकर शरणार्थी के रुप में बसने के लिये बाध्य हो गये. इन्हीं में शामिल हैं कालिम्पोंग क्षेत्र से पूर्व विधायक और नेपाली के महाकवि के रुप में ख्यात मोहन दुखुन जो अब सिलीगुड़ी के स्थायी निवासी हो गये हैं. उनके अलावा कर्सियांग के पूर्व विधायक तुलसी भट्टराई भी यहीं बस गये.
इन लोगों का अब फिर पहाड़ में स्थायी रुप से जाना नहीं हो सका. सैकड़ों लोगों के घर जला दिये गये. वरिष्ठ पत्रकार डॉ. आरपी सिंह के अनुसार इस दौरान एक पत्रकार निर्मल राई की हत्या भी कर दी गई. आरोप लगा कि यह हत्या जीएनएलएफ के कद्दावर नेता सीके प्रधान ने कराई थी. हालांकि बाद में वे भी सत्ता संघर्ष के शिकार हो गये और उनकी भी शहर के एक व्यस्त इलाके में हत्या कर दी गई. आंदोलन के दौर को याद कर कई बुजुर्ग आज भी कांप उठते हैं.
72 घंटे बंद से हुई शुरुआत, हालात बेकाबू हुए
शिव चटर्जी के अनुसार 12 मई 1986 को जीएनएलएफ ने पार्वत्य क्षेत्र में 72 घंटाव्यापी बंद का आह्वान किया. इसी रोज दार्जिलिंग शहर में आंदोलनकारियों ने खुकरी रैली निकाली जिससे शहर में भय व्याप्त हो गया. हालांकि उस समय जिला पुलिस मूक दर्शक बनी रही. धीरे – धीरे हालात बेकाबू होते चले गये. बंद के दौरान ही एनबीएसटीसी की एक बस पर सिलीगुड़ी से मिरिक जाने के क्रम में आंदोलनकारियों ने हमला किया तो बस में तैनात सुरक्षाकर्मी की गोलीबारी में एक हमलावर मारा गया. उसी दौरान एक अन्य बस पर सिलीगुड़ी से कालिम्पोंग की ओर जाने के क्रम में आंदोलनकारियों ने हमला बोल दिया. इस दौरान सुरक्षाबल से एक राइफल, एक रिवाल्वर और कारतूस लूट लिये गये.
एक ही दिन में छह की मौत
24 मई 1986 को एक जीएनएलएफ कार्यकर्ता की गिरफ्तारी के विरोध में महानदी बाजार में विरोध प्रदर्शन किया गया. इस दौरान सुरक्षाबल की गोलीबारी में छह लोगों की मौत हो गई जबकि कई जख्मी हो गये. कर्सियांग में कर्फ्यू लागू कर दिया गया और शेष पार्वत्य महकमों में धारा-144 लागू कर दी गई. बैंक और डाकघरों समेत सार्वजनिक प्रतिष्ठान बंद कर दिये गये. स्कूल कॉलेजों को अनिश्चितकाल के लिये बंद कर दिया गया. पहाड़ पर पिछले तीन महीने से जो वर्तमान आंदोलन चल रहा है,उसमें भी दस लोग मारे जा चुके हैं.कई स्थानों पर बम विस्फोट की घटनाएं हो चुकी है. आगजनी में सैकडों करोड़ रूपये की संपत्ति खाक हो गयी है. पिछले 90 दिनों से भी अधिक समय से बेमियादी बंद जारी है और उसके बाद भी स्थिति जस की तस ही बनी हुयी है.यह आंदोलन अब कहां जाकर रूकेगा कोई नहीं बता सकता.
