चामुर्ची. डुआर्स क्षेत्र के चाय बागानों में आदिवासियों के महापर्व करम उत्सव को लेकर वातावरण उल्लासमय हो चला है. ये लोग अपने ‘करम’ देव को जंगल से लाने के लिए मांदर और नगाड़ों के साथ जा रहे हैं. इस दौरान प्रकृति के आनंदमय परिवेश के साथ ताल मिलाते हुए आदिवासी समाज के युवक-युवतियां थिरकने लगे हैं. इस दौरान कांस फूल का गजरा लगाकर युवतियां गीत गाते हुए जा रही हैं. मांदर की थाप पर युवक-युवतियां झूम रहे हैं. करम उत्सव को लेकर डुआर्स क्षेत्र में यही दृश्य सभी जगहों पर देखने को मिल रहा है.
आदिवासी युवतियों ने नदियों से लाये बालू को साल के पत्तों के दोने में रखकर उनमें मक्का, मटर और गेहूं के बीज लगा दिये हैं. हर रोज बहनें इन बीजों को अंकुरित होते हुए देखने के लिए विकल हैं. उधर, पुरुष समाज भी करम डाल की तलाश में जंगलों में घूम रहे हैं. इस तरह के नागपुरी गीतों के बोल लोगों के कानों में रस घोल रहे हैं :
दुलारी बहन कहत है करम राजा, भैया बजाय बांसी, छोटकी बहन पूजत है करम डाइर, दूसरा भइया बजात है मांदर, फूलवा लोहरइते जाग गे सजनी एक गोड़ बहरी, एक गोड़ देहरी गे सजनी, आइज भी खेलब झुमइर गे सजनी हे करम भाई.
