सिलीगुड़ी. दार्जीलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखालैंड आंदोलन तेज होने के बाद सिलीगुड़ी में पहाड़ से आनेवाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है. पहले दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में रहनेवाले तृणमूल कांग्रेस के नेता और समर्थक गोजमुमो के डर से सिलीगुड़ी आये और अब आम लोग भी सिलीगुड़ी में अपना डेरा बसाने में लगे हुए हैं. राज्य के पर्यटन मंत्री तथा तृणमूल कांग्रेस के जिला अध्यक्ष गौतम देव ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है. उनका कहना है कि 150 से भी अधिक तृणमूल कांग्रेस के नेता और समर्थक पहाड़ पर अपना घर-बार छोड़ने के लिए विवश हुए हैं. इन सभी को सिलीगुड़ी के विभिन्न राहत शिविरों में रखा गया है.
इस बीच, दार्जीलिंग पर्वतीय क्षेत्र से पिछले कुछ दिनों के दौरान पांच हजार से भी अधिक लोग सिलीगुड़ी आ गये हैं. यह लोग यहां या तो अपने किसी रिश्तेदार के यहां रूके हुए हैं या फिर किराये की मकान तलाश रहे हैं. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सिलीगुड़ी के मिलन मोड़, चंपासारी, गुरूंग बस्ती, प्रधान नगर, पानीघाटा, सालूगाड़ा आदि इलाकों में दार्जीलिंग से आने वाले लोग अपने रिश्तेदारों के घरों में रूक रहे हैं या फिर किराये की मकान ले रहे हैं. ऐसा नहीं है कि दार्जीलिंग लोग इससे पहले सिलीगुड़ी में किराये का मकान नहीं लेते थे, लेकिन इस बार परिस्थिति कुछ अलग है. आम तौर पर ठंड के समय भारी संख्या में पहाड़ से लोग सिलीगुड़ी में उतरते हैं और एक या दो महीने के लिए किराये का मकान लेकर रहते हैं. ठंड खत्म होते ही वह सभी पहाड़ लौट जाते हैं. न केवल दार्जिलिंग, बल्कि कालिम्पोंग, कर्सियांग और मिरिक से लोग सिलीगुड़ी में शरण लेने के लिए आ रहे हैं. इसमें दार्जिलिंग और कालिम्पोंग से आने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है.
सूत्रों ने बताया कि गोरखालैंड आंदोलन का सबसे अधिक जोर दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में है. करीब एक महीने से पहाड़ पर बेमियादी बंद जारी है. आने वाले दो-चार दिनों में बंद खत्म होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है. इसके अलावा सिलीगुड़ी में पहाड़ के लिए एक तरह से अघोषित नाकेबंदी जारी है. न केवल पुलिस, बल्कि आम लोग भी खाद्य पदार्थों से लदे वाहनों को पहाड़ पर नहीं जाने दे रहे हैं. घर में खाने-पीने के सामान का स्टॉक खत्म हो गया है. आलम यह है कि सुदूरवर्ती इलाके के लोग एक विशेष प्रकार की सब्जी क्वास तथा राई साग खाकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. ऐसी परिस्थिति के कारण ही लोग दार्जिलिंग पहाड़ छोड़कर सिलीगुड़ी के विभिन्न इलाकों में शरण ले रहे हैं.
कालिम्पोंग से मकान की तलाश में आये शरण छेत्री ने बताया कि घर में खाने-पीने का संकट है. परिवार के लोग मिलन मोड़ इलाके में एक रिश्तेदार के घर रूके हुए हैं. इस बीच, वह मकान तलाशने में जुटे हुए हैं. मकान मिलते ही परिवार के सभी सदस्य वहां चले जायेंगे. पहाड़ पर एक बार स्थिति सामान्य होने पर ही वापस अपने घर लौटेंगे. प्राप्त जानकारी के अनुसार, मिलन मोड़, देवीडांगा, सालुगाड़ा, गुरूंग बस्ती, सालबाड़ी आदि इलाके में गोरखा लोगों की संख्या अधिक है. इसी वजह से पहाड़ के लोग इन्हीं इलाकों में घर-वार तलाश रहे हैं. इसके अलावा डुवार्स के इलाकों में भी पहाड़ से आकर मकान तलाशने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई है. पहाड़ के लोगों की इस मजबूरी का फायदा किराये पर मकान लगाने वाले लोग उठा रहे हैं. किराये में अचानक काफी बढ़ोत्तरी कर दी गई है. पहाड़ से भारी संख्या में शरणार्थियों के आने की खबर ने पुलिस की भी नींद उड़ा दी है. हालांकि इस संबंध में पुलिस के कोई भी आला अधिकारी कुछ खुलकर नहीं कहना चाह रहे हैं. लेकिन पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार शहर में आने वाले नये लोगों पर नजर रखी जा रही है. इनका डाटा भी बनाया जा रहा है.
इस बारे में जब पुलिस कमिश्नर नीरज सिंह से बात की गयी तो उन्होंने कहा कि जो भी लोग मकान किराये पर दे रहे हैं, उन्हें पुलिस द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना होगा. किरायेदारों की पूरी जानकारी पुलिस को देनी पड़ेगी. यह नियम पहले से ही लागू है और सभी मकान मालिकों को इसका पालन करना होगा.
दूसरी तरफ पहाड़ पर इस संकट के लिए विपक्ष ने राज्य की तृणमूल सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. भाजपा नेता नंदन दास का कहना है कि बेमियादी बंद से पहाड़ पर संकट लगातार गहरा रहा है. लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं. ऐसे में वहां के लोग और क्या कर सकते हैं. उन्होंने इस संकट के लिए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पहाड़ पर शांति बनी हुई थी और मुख्यमंत्री ने जानबुझ कर गोरखालैंड की आग को भड़काया है. उन्होंने इस समस्या के तत्काल समाधान की मांग की.
