लेकिन इस बार गोरखालैंड आंदोलन ने स्थानीय एवं समतल के पर्यटन व्यवसायियों की आशा पर तुषारापात कर दिया है. दुर्गा पूजा के करीब ढाई माह पहले कोई बुकिंग नहीं हो रही है, बल्कि जिन पर्यटकों ने पहले से बुकिंग करा ली थी उन्होंने भी इसे रद्द करा दिया है. वहीं, पहाड़ से संलग्न डुआर्स क्षेत्र के पर्यटन व्यवसायियों के चेहरे खिले हुए हैं कारण कि अब पर्यटकों ने पहाड़ संलग्न डुआर्स की ओर रुख करना शुरू कर दिया है. मानसून के बाद जब जंगल खुलेंगे, तो डुआर्स पर्यटन कारोबारियों के लिए बड़ा सहारा बन सकता है.
गौरतलब है कि डुआर्स व तराई क्षेत्र में भी एक से बढ़कर एक खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं, जहां प्रकृति प्रेमी हर साल बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. मिसाल के बतौर जलदापाड़ा और गोरूमारा नेशनल पार्क दूर-दूर के सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. हालांकि जो टूर ऑपरेटर पहाड़ पर ही निर्भर हैं उनकी स्थिति दयनीय होती जा रही है. पहाड़ में वर्तमान में जो हालात हैं उसमें पर्यटक वहां जाना सुरक्षित नहीं समझ रहे. टूर ऑपरेटरों की मानें तो, केवल दुर्गा पूजा के दौरान पहाड़ पर हर साल एक लाख से अधिक पर्यटक आते हैं.
दूसरी तरफ, डुआर्स में कुल मिलाकर शांति है, इसलिए वह पर्यटकों को पसंद आ रहा है. हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि डुआर्स में भी गोरखालैंड आंदोलन की तपिश कमोबेश महसूस की जा रही है. लेकिन वहां का आदिवासी समुदाय गोरखालैंड राज्य में डुआर्स को शामिल कराने की मांग का खुलकर विरोध कर रहा है. यही वजह है कि डुआर्स अब तक शांत है और निकट भविष्य में शांत रहने की उम्मीद की जा रही है. वैसे भी डुआर्स के चाय बागान, छोटी छोटी पहाड़ियां एवं वनांचल पर्यटकों के आकर्षण का शुरू से केंद्र रहे हैं. पहाड़ एवं सिक्किम जाने वाले सैलानियों के लिये डुआर्स से बेहतर विकल्प अन्य कोई स्थान हो ही नहीं सकता. इसका लाभ टूर ऑपरेटर भी ले सकते हैं. हालांकि व्यवसाय की भी अपनी अपनी परेशानियां होती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
