सिलीगुड़ी: अलग राज्य गोरखालैंड आंदोलन की वजह से पहाड़वासियों के साथ तीस्ता व उनके दस साथियों ने भी अपने भोजन के साथ समझौता कर लिया है. रोजाना 15 किलोग्राम मीट खाने वाले इन जानवरों को वर्तमान में बस जिंदा रहने भर के लिए भोजन दिया जा रहा है. पहाड़ पर बंद की स्थिति लगातार जारी रहने से समस्या गंभीर होने की आशंका जतायी जा रही है.
गोरखालैंड आंदोलन को लेकर पहाड़ की स्थिति काफी गरम है. लगातार जारी बंद और बीच-बीच में हिंसक झड़पों ने ठंडे पहाड़ों के मौसम को गरम कर रखा है. इस आंदोलन की वजह से पहाड़ पर खाद्य संकट उत्पन्न होता दिख रहा है. बच्चे, वृद्ध और अस्पतालों में भरती मरीजों के लिए खाद्य समस्या ने दस्तक दे दी है. खाद्य संकट से निजात पाने के लिए पहाड़ के आम नागरिक व आंदोलनकारी राह ढूंढ़ने में जुटे हैं. मनुष्य तो एक तरफ, आंदोलन की वजह से यहां जानवर भी खाने को तरस रहे हैं.
दार्जिलिंग में पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क (चिड़ियाघर) स्थित है. इस पार्क में विभिन्न तरह के पशु-पक्षियों को रखा गया है. तीस्ता और उसके दस साथी भी इसी पार्क में रहते हैं. इस पार्क का सबसे बड़ा आकर्षण स्नो लेपर्ड है, जिसका नाम तीस्ता है. गोरखालैंड आंदोलन की वजह से तीस्ता व उसके साथियों ने अपने दैनिक आहार से भी समझौता कर लिया है.
पार्क प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार स्नो लेपर्ड के दैनिक आहार के अनुसार तीन प्रकार का मांस मुहैया कराया जाता है. इनके दैनिक आहार तालिका के अनुसार, प्रतिदिन बीफ, मटन और चिकन मिलाकर एक स्नो लेपर्ड को करीब 7 से 15 किलो मांस दिया जाता है. आंदोलन की वजह से इनके दैनिक आहार को काफी कम कर दिया है. स्नो लेपर्ड व पार्क में रहने वाले अन्य पशु-पक्षियों का भोजन ग्रामीन इलाकों से सप्लाई किया जाता है. निर्धारित रेट पर मांस व अन्य भोजन मुहैया कराने के लिये टेंडर के माध्यम से सप्लायर नियुक्त किया जाता है. आंदोलन की वजह से पहाड़ पर यातायात ठप है. सप्लायर पैदल लंबी दूरी तय कर किसी तरह माल पहुंचा रहा है. ऐसी स्थिति में मांग के अनुसार भोजन सामग्री मुहैया कराना सप्लायर के लिए भी कठिन है.
पद्मजा नाइडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क के निदेशक पैर चांद ने बताया कि मांस व अन्य खाद्य सामग्री ग्रामीण इलाकों से सप्लाई होती है. बंद की वजह से सप्लायर मांग के अनुसार सामग्री मुहैया नहीं करा पा रहा है. पहाड़ की स्थिति को देखते हुए पार्क का भंडार भी समाप्ति की ओर है. इसलिए जानवरों को दैनिक आहार से काफी कम मात्रा में आहार दिया जा रहा है. श्री चांद ने आगे बताया कि इस संबंध में जिला प्रशासन के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है. जानवरों के भोजन की व्यवस्था ना करने पर आगामी दिनों में स्थिति भयावह हो सकती है.
