पहाड़ पर अशांति से तृणमूल में बेचैनी

सिलीगुड़ी: अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में जारी आंदोलन के बाद तृणमूल कांग्रेस शिविर में खलबली मची हुई है. आलम यह है कि पहाड़ पर तृणमूल के तमाम आला नेता ही नहीं, बल्कि कार्यकर्ता भी घर छोड़कर सिलीगुड़ी आ गये हैं. इन लोगों ने सिलीगुड़ी में बनाये गये विभिन्न कैम्पों […]

सिलीगुड़ी: अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में जारी आंदोलन के बाद तृणमूल कांग्रेस शिविर में खलबली मची हुई है. आलम यह है कि पहाड़ पर तृणमूल के तमाम आला नेता ही नहीं, बल्कि कार्यकर्ता भी घर छोड़कर सिलीगुड़ी आ गये हैं. इन लोगों ने सिलीगुड़ी में बनाये गये विभिन्न कैम्पों में शरण ले रखी है. यहां उल्लेखनीय है कि एक महीना पहले पहाड़ पर हालत खराब होने से पहले तृणमूल कांग्रेस काफी ताकतवर थी. तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार गोजमुमो को पटकनी देते हुए मिरिक नगरपालिका पर भी कब्जा कर लिया था. गोरखालैंड आंदोलन के फिर से शुरू होने के बाद पहाड़ पर हिंसा का दौर शुरू हो चुका है. हर दिन सरकारी कार्यालय फूंके जा रहे हैं.
गोजमुमो तथा गोरखालैंड समर्थकों के निशाने पर तृणमूल कांग्रेस है. अब तक दो दर्जन से अधिक तृणमूल नेताओं के घर फूंक दिये गये हैं. हिल्स तृणमूल के अध्यक्ष राजेन मुखिया, प्रवक्ता बिन्नी शर्मा आदि जैसे तमाम आला नेता सिलीगुड़ी में रह रहे हैं. तृणमूल नेताओं के डर का आलम ऐसा है कि अब यही लोग गोजमुमो से हिंसा छोड़कर राज्य तथा केन्द्र सरकार से बातचीत की अपील कर रहे हैं. सिलीगुड़ी जर्नलिस्ट क्लब में शुक्रवार को संवाददाताओं से बातचीत करते हुए हिल्स तृणमूल के अध्यक्ष राजेन मुखिया ने कुछ इसी प्रकार की अपील की है. उन्होंने कहा है कि हिंसा से किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. गोरखालैंड राज्य की मांग करने वाले लोग गोरखा भाइयों के घर में ही आग लगा रहे हैं और उनको पहाड़ से खदेड़ रहे हैं. इससे समस्या का समाधान नहीं होगा. उन्होंने माना कि गोरखा जाति को भावनात्मक मुद्दे से काफी लगाव होता है. यह जाति काफी भावुक है. नेपाली भाषा के अतिक्रमण की अफवाह फैला कर गोरखा जाति को भड़काया गया. वास्तविकता यह है कि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र के किसी भी स्कूल में बांग्ला भाषा को अनिवार्य नहीं किया गया है. राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही इस बात को स्पष्ट कर दिया था, उसके बाद ही भाषा विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. उसके बाद से ही पहाड़ के हालात बिगड़ गये हैं.

उन्होंने आगे कहा कि गोरखालैंड राज्य को लेकर सभी पक्ष के लोगों को आपस में बातचीत करनी चाहिए. मारकाट से कोई लाभ नहीं होगा. 1986 में भी गोरखालैंड आंदोलन हुआ था और उस समय 1250 लोग मारे गये थे. 2007 में बिमल गुरुंग के नेतृत्व में गोजमुमो के नाम से नयी पार्टी बनी और फिर गोरखालैंड आंदोलन शुरू हो गया. इस बार भी अब तक आठ लोग मारे जा चुके हैं.

उन्होंने राज्य सरकार से भी आंदोलनकारियों से बातचीत करने की अपील की. श्री मुखिया ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि इस मामले में अब तक उनकी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कोई बातचीत नहीं हुई है. लेकिन उन्होंने दार्जिलिंग जिले के प्रभारी तथा मंत्री अरूप विश्वास तथा राज्य के पर्यटन मंत्री गौतम देव से गोजमुमो के साथ बातचीत शुरू करने की पहल की अपील की है. उन्होंने कहा कि गोरखालैंड आंदोलन को आगे ले जाने के लिए पहाड़ के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को लेकर गोरखालैंड मूवमेंट कॉर्डिनेशन कमेटी का भी गठन किया गया है. इनको भी आगे आकर सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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