राज्य को नियम के अनुसार डीए का भुगतान करना ही होगा : सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों के बकाया महंगाई भत्ते (डीए) से जुड़े मामले की सुनवाई में राज्य सरकार को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सवालों का सामना करना पड़ा.

संवाददाता, कोलकाता

पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों के बकाया महंगाई भत्ते (डीए) से जुड़े मामले की सुनवाई में राज्य सरकार को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सवालों का सामना करना पड़ा. गुरुवार को सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने कहा कि मामले में राज्य सरकार भ्रम पैदा कर इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रही है. पिछले दिनों सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने खुद कहा था कि वह ‘रोपा एक्ट’ (पश्चिम बंगाल वेतन व भत्ता संशोधन 2019) के आधार पर सरकारी कर्मचारियों को डीए देगी. साथ ही राज्य सरकार ने बकाया डीए का भुगतान करने की भी बात कही थी. इसलिए राज्य सरकार अपने इस बयान से पीछे नहीं हट सकती. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि राज्य सरकार को उस नियम का पालन करते हुए डीए का भुगतान करना ही होगा. सुप्रीम कोर्ट ने पहले राज्य सरकार को बकाया डीए की 25 प्रतिशत राशि का भुगतान करने का आदेश दिया था. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को छह हफ्ते का समय दिया था, जिसकी अवधि 27 जून को समाप्त हो चुकी है. राज्य सरकार ने उस अवधि में डीए का भुगतान नहीं कहा. अब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से बकाया डीए का भुगतान करने के लिए और छह महीने का समय मांगा है. राज्य सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार से लगातार मामले की सुनवाई की है. गुरुवार को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति पीके मिश्रा की पीठ ने सुनवाई की. इस दौरान राज्य के वकील श्याम दीवान को सुप्रीम कोर्ट के सवालों का सामना करना पड़ा. सरकारी कर्मचारियों की ओर से वकील करुणा नंदी ने कहा कि केरल सरकार ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का पालन नहीं किया, फिर भी उन्होंने कर्मचारियों को नियमित डीए दिया.

करुणा नंदी ने तर्क देते हुए कहा कि इससे साबित होता है कि केंद्रीय सूचकांक का पालन न करने पर भी सरकारी कर्मचारियों के लिए डीए अनिवार्य है. नंदी ने आगे कहा कि एआइसीपीआइ वैज्ञानिक पद्धति है. श्रम ब्यूरो ने इसे तैयार किया है. पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारियों के लिए कोई अलग सूचकांक नहीं है. राज्य सरकार अपने ही नियमों का पालन नहीं करती. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्व में राज्य ने स्वयं कहा था कि वह रोपा के आधार पर डीए देगा. कहा गया था कि बकाया डीए भी दिया जायेगा. इसलिए राज्य को कानून का पालन करना होगा. बकाया महंगाई भत्ते के निपटान के संबंध में, राज्य ने पहले कहा था कि लाखों कर्मचारियों के बकाया महंगाई भत्ते के निपटान के लिए बहुत अधिक धनराशि की आवश्यकता है. दूसरी ओर, राज्य वित्तीय संकट से जूझ रहा है और वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में ऐसा कोई आवंटन नहीं है. इसलिए, बकाया महंगाई भत्ते का 25 प्रतिशत हिस्सा अभी निपटाना संभव नहीं है. राज्य के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश की समीक्षा का भी अनुरोध किया. सुनवाई जारी रहेगी. अगली सुनवाई मंगलवार को होगी.

केंद्रीय दर पर डीए देना अनिवार्य नहीं : राज्य

राज्य के वकील श्याम दीवान ने इसका विरोध करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने डीए देने से पहले मूल्य वृद्धि के मुद्दे पर विचार किया था. बजट के मुद्दे को भी ध्यान में रखा गया था. इस संबंध में केंद्र सरकार और राज्य की नीति अलग-अलग है. चूंकि इस मामले से जुड़ा राज्य है, इसलिए राज्य को यह तय करने का अधिकार है कि राज्य कर्मचारियों को किस आधार पर डीए दिया जायेगा. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि डीए केंद्रीय दर पर ही देना होगा, यह अनिवार्य नहीं है. राज्य के वकील ने यह भी कहा कि राज्य के अधिसूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि डीए में नियमित अंतराल पर वृद्धि की जायेगी. रोपा अधिनियम या ‘रोपा नियम’ में भी कहीं यह नहीं लिखा है कि डीए किसी अलग सूचकांक के आधार पर दिया जायेगा. ऐसे में राज्य सरकार को अपनी वित्तीय नीति के आधार पर आवश्यक कदम उठाने की स्वतंत्रता है.

क्या कहा याचिकाकर्ता के वकील ने

याचिकाकर्ता के एक वकील रऊफ रहीम ने भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार बिना किसी विशिष्ट नीति के मनमाने ढंग से डीए दे रही है. इसके अलावा, मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं की कीमतें जिस दर से बढ़ रही हैं, उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई दर पर डीए देना आवश्यक है. राज्य यह नहीं कह सकता कि वे वेतन आयोग की सिफारिशों का पालन नहीं करेंगे. फिर वे किस सिद्धांत पर या किस आधार पर डीए दे रहे हैं? इसके बाद, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार अपनी ओर से भ्रम पैदा करके इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.

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Published by: Akhilesh kumar singh

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