छापे के समय निजी हस्तक्षेप कोर्ट की अवमानना

दालतों ने छापेमारी के दौरान जब्त सामग्री पर जांच एजेंसियों के नियंत्रण और सुरक्षा को लगातार बरकरार रखा है. जांच की इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का निजी हस्तक्षेप 'न्यायालय की अवमानना' या संबंधित कानूनों के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों को आकर्षित कर सकता है.

कोलकाता.

अदालतों ने छापेमारी के दौरान जब्त सामग्री पर जांच एजेंसियों के नियंत्रण और सुरक्षा को लगातार बरकरार रखा है. जांच की इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का निजी हस्तक्षेप ””न्यायालय की अवमानना”” या संबंधित कानूनों के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों को आकर्षित कर सकता है. प्रभात खबर के ऑनलाइन सवालों का जवाब देते हुए कलकत्ता हाइकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देवब्रत उपाध्याय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इस बात पर जोर दिया है कि छापेमारी के दौरान अधिकृत जब्ती जांच का एक अभिन्न अंग है और इसे किसी भी तरह से कमजोर नहीं किया जा सकता. कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया बनाम जेसीबी इंडिया लिमिटेड (2019) के मामले में, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अधिनियम के तहत जारी सर्च वारंट में जब्ती का अधिकार अंतर्निहित होता है. इसी तरह, पीएमएलए (पीएमएलए) मामलों में, जैसे विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ के मामले में कोर्ट ने माना कि जब्त दस्तावेजों को अधिकारियों द्वारा ही संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न हो.

उन्होंने कहा कि बीएनएसएस की धारा 106 (पूर्व में सीआरपीसी 102) जांच एजेंसी को किसी भी ऐसी संपत्ति को जब्त करने का सीधा अधिकार देती है, जिसके बारे में संदेह है कि वह चोरी की है या किसी अपराध से जुड़ी है.

इस प्रकार, धारा 106 और 105 के तहत पुलिस को दस्तावेजों को जब्त करने और सील करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है, और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप न्यायालय की अवमानना या आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार बन सकता है.

प्रश्न : इडी की छापेमारी के दौरान क्या राज्य पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है.

राहुल सिंह, बैरकपुर

उत्तर : नहीं, इडी एक स्वायत्त संस्था है और इसे आर्थिक धोखाधड़ी व पीएमएलए मामले में कहीं भी छापेमारी करने का अधिकार है, इसमें किसी भी राज्य की पुलिस कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

प्रश्न : मैंने 50 हजार रुपये कर्ज दिये थे. तीन-चार माह गुजर जाने के बावजूद अब तक रुपया वापस नहीं कर रहा. क्या करें?

रंजीत पासवान, श्यामनगर

उत्तर : रुपये देने का प्रमाण होने पर आप उसे अधिवक्ता के माध्यम से लीगल नोटिस भेजें और अगर वह जवाब नहीं देता या आप संतुष्ट नहीं होते, तो उसके खिलाफ थाने में मामला दायर करायें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By BIJAY KUMAR

BIJAY KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >