कोलकाता.
पश्चिम बंगाल में चल रही एसआइआर प्रक्रिया को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने स्पष्ट किया कि एसआइआर से जुड़े दावों और आपत्तियों का सत्यापन 24 अक्तूबर 2025 की अधिसूचना में उल्लिखित दस्तावेजों तथा इस न्यायालय द्वारा पूर्व में पारित आदेशों के आधार पर किया जायेगा. पीठ ने कहा कि आठ सितंबर 2025 के आदेश के तहत आधार कार्ड को स्वीकार करने की अनुमति दी गयी थी, जबकि 19 जनवरी 2026 के आदेश में माध्यमिक परीक्षा (कक्षा 10) के प्रवेश पत्र और माध्यमिक परीक्षा के उत्तीर्ण प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की अनुमति दी गयी थी. अदालत ने निर्देश दिया कि 14 फरवरी 2026 की अंतिम तिथि तक या उससे पहले इलेक्ट्रॉनिक अथवा भौतिक रूप से प्रस्तुत किये गये सभी दस्तावेजों पर विचार किया जायेगा. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित दस्तावेजों के संबंध में न्यायिक अधिकारियों को संतुष्ट करना मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (इआरओ) और सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (एइआरओ) की जिम्मेदारी होगी.सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने पीठ को बताया कि बड़े पैमाने पर फर्जी आधार कार्ड का इस्तेमाल हो रहा है और देश में फर्जी आधार के अधिकतर मामले बंगाल से जुड़े हैं. उन्होंने कहा कि व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि सीमावर्ती जिलों में बड़ी संख्या में आधार कार्ड बनाये जाते हैं. अदालत यदि फर्जी दस्तावेजों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए कोई नियम जोड़े तो बेहतर होगा. उपाध्याय ने यह भी कहा कि जब पुलिस बांग्लादेशी या रोहिंग्या नागरिकों को हिरासत में लेती है, तो उनके पास अक्सर बंगाल का आधार कार्ड पाया जाता है. इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इस विषय में गहन जांच की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन फिलहाल यह उपयुक्त समय नहीं है. न्यायालय ने कहा कि पहले उचित माहौल बनने दिया जाये.पीठ में शामिल न्यायमूर्ति बागची ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर भारत सरकार से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन का अनुरोध किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि यदि आधार कार्ड बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी से हासिल किये जा रहे हैं, तो इसे कानूनी रूप से विनियमित करना आवश्यक है. अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि चूंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर आधार को पहचान प्रमाण के रूप में शामिल किया गया है, इसलिए वर्तमान व्यवस्था में इसे स्वीकार करना होगा.
