कोलकाता के हेस्टिंग्स थाने में 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस की ‘शहीद दिवस’ रैली को लेकर प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गयी. आरोप है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के उस निर्देश का उल्लंघन किया गया, जिसमें रैली में शामिल होने वाले लोगों की संख्या 2,500 तक सीमित रखने के लिए कहा गया था. रीतब्रत बनर्जी गुट की रैली की तुलना में ममता के कार्यक्रम में कई गुणा अधिक लोग पहुंचे. मंच से ममता बनर्जी का संदेश साफ था- खेला होबे! यानी हम खेलेंगे. अब थोड़ी प्रैक्टिस कर लो, जल्द ही बैट और बॉल का खेल शुरू होगा. लंबे समय तक कांग्रेस की सिपाही रही ममता बनर्जी के बारे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या 1977 की इंदिरा गांधी की तरह 2026 की ममता बनर्जी भी वापसी करेंगी?
इंदिरा गांधी के 1977 वाले ‘प्लेबुक’ से प्रेरणा?
सत्ता गंवाने के महज 3 महीने बाद ही ममता बनर्जी 1977 की इंदिरा गांधी के राजनीतिक ‘प्लेबुक’ को अपनाती दिख रही हैं, जहां वे अपनी छवि और पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए सीधे टकराव की नीति पर चल रही हैं. अंग्रेजी वेबसाइट द टेलीग्राफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1977 की इंदिरा गांधी और 2026 की ममता बनर्जी के बीच कई समानताएं हैं.
रोना-धोना बंद करो, पन्ना पलटो और आगे बढ़ो : इंदिरा
दोनों के साथ काम कर चुके पूर्व नौकरशाह और राज्यसभा सांसद जवाहर कहते हैं कि ममता में इंदिरा की तरह लड़ने की पूरी क्षमता है. जब 1977 में कांग्रेस पस्त थी, तब 3 महीने बाद ही राज्य के चुनावों की घोषणा हुई और इंदिरा खुद चुनाव प्रचार में कूद पड़ीं. नीरजा चौधरी की किताब ‘हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’ का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि इंदिरा ने तब युवा अंबिका सोनी से कहा था- यह रोना-धोना बंद करो, हमेशा बत्तीसी दिखाते हुए खुद को खुश दिखाओ. मुस्कुराओ. चमड़ी मोटी करो, पन्ना पलटो और आगे बढ़ो. ममता का भी रुख ऐसा ही दिख रहा है.
भाजपा का ‘पासबालिश’ (तकिया) बनना बंद करो. जो चोर थे, वे भाजपा में जा चुके हैं. मैं उन्हें कभी वापस नहीं लूंगी. यदि और लोग भी जाना चाहें, तो चले जायें. मुझे खुशी होगी. मेरे युवा, छात्र और पुराने-नये कार्यकर्ता हर खाली जगह को भरने के लिए तैयार हैं. -ममता बनर्जी, 21 जुलाई 2026 को तारामंडल के पास
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ममता और इंदिरा की समानताएं
- 1977 में इंदिरा गांधी को लगता था कि मोरारजी देसाई ने उनके घर में जासूसी उपकरण (बग्स) लगा रखे हैं. इसलिए वह मेहमानों से बगीचे में मिलती थीं. बारुईपुर में 11 साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के बाद वहां जाने से रोका गया, तो ममता ने आरोप लगाया कि उनके कालीघाट स्थित घर के बाहर भारी पुलिस व अर्धसैनिक बल तैनात कर उन्हें ‘हाउस अरेस्ट’ कर लिया गया है.
- हार के बाद इंदिरा गांधी ने हरिद्वार में आनंदमयी मां की शरण ली थी. ममता बनर्जी भी चुनाव हारने के कुछ ही दिनों भीतर काली मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचीं थीं.
- संकट के दौर में इंदिरा गांधी ने अपने धुर विरोधी राज नारायण और जयप्रकाश नारायण से मुलाकात की थी. ममता बनर्जी ने भी हार के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की, जिनको वह 2024 के लोकसभा चुनाव में महत्व देने के लिए तैयार नहीं थीं.
- इंदिरा के लिए उनके बेटे संजय गांधी राजनीतिक चुनौती बन गये थे. ठीक वैसी ही परिस्थितियां ममता के सामने उनके भतीजे और उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को लेकर हैं. अभिषेक के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं. पुराने वफादार भी उनके खिलाफ बोल रहे हैं. हालांकि, इंदिरा को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था (जो उनके लिए टर्निंग प्वाइंट बना), लेकिन ममता के खिलाफ अब तक ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है.
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शुभेंदु अधिकारी सरकार का ‘यूपी मॉडल’ और ममता का मौका
जनता पार्टी की वर्ष 1977 की सरकार और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की वर्तमान सरकार के बीच तुलना करते हुए जवाहर सरकार कहते हैं कि शुभेंदु अधिकारी खुद ममता को मौका दे रहे हैं. हॉकरों को हटाना, रेड रोड से धार्मिक जुलूसों को हटाना, चुनिंदा जगहों पर बुलडोजर चलाना. शुभेंदु उत्तर प्रदेश के ‘योगी मॉडल’ पर तेजी से काम कर रहे हैं. उनकी यह आक्रामक शैली ममता को सड़क पर उतरने का मौका दे रही है.
जवाहर सरकार कहते हैं कि स्ट्रीट-फाइटर ममता ने भी इस मौके को लपकते हुए कहा है कि वे अब जिलों का दौरा करेंगी. वह कहती हैं कि पुलिस उन्हें कहीं कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं दे रही है. लेकिन वह हार नहीं मानेंगी. अनुमति नहीं मिली, तो वह पैदल ही सड़कों पर चलेंगी. उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर दिल्ली की केंद्र सरकार हिलती है, तो कोलकाता की सरकार भी डगमगायेगी.
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कमजोर हुई है नरेंद्र मोदी सरकार : जवाहर सरकार
जवाहर सरकार के अनुसार, केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार भी कमजोर हुई है. राम मंदिर में दान चोरी का मामला और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन ने केंद्र की नींव हिला दी है. सीजेपी के आंदोलन की वजह से धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा.
क्या वाकई आसान है ममता की राह?
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), मुंबई के कुलपति और ‘रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व’ के लेखक प्रोफेसर बद्री नारायण का मानना है कि ममता के लिए यह राह बेहद कठिन है. बद्री नारायण के अनुसार, इंदिरा के समय विपक्ष बिखरा हुआ था. लेकिन आज की भाजपा बेहद संगठित है. आप एक विशाल और मजबूत तंत्र से लड़ रहे हैं. मुझे ममता का उभार इंदिरा की तरह होता नहीं दिखता.
- सड़क की राजनीति बनाम सामाजिक राजनीति प्रो बद्री नारायण का मानना है कि सड़क की राजनीति अब भाजपा की ‘सामाजिक राजनीति’ का मुकाबला नहीं कर सकती. भाजपा सत्ता में आने के बाद सामाजिक ताने-बाने पर काम करती है और एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को हावी नहीं होने देती.
- प्रो नारायण के मुताबिक, ममता का ‘मां, माटी, मानुष’ और धर्मनिरपेक्षता का नारा अब हिंदुत्व के व्यापक और मजबूत सामाजिक जुड़ाव के सामने फीका पड़ रहा है. बंगाल में उत्तर प्रदेश की तुलना में जातिगत विभाजन कम है, जिससे ‘हिंदुत्व एकता’ का कार्ड ज्यादा असरदार साबित हो रहा है.
- बद्री नारायण कहते हैं कि ममता ‘हार्ड हिंदुत्व’ का दावा नहीं कर सकतीं. उन्हें ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का सहारा लेना पड़ेगा, लेकिन राहुल गांधी या अखिलेश यादव जैसे नेताओं के उदाहरण बताते हैं कि यह रणनीति चुनाव जिताने में बहुत सफल नहीं रही है.
- प्रोफेसर बद्री नारायण के मुताबिक, ममता बनर्जी की वापसी अब केवल उनके अपने कैडर या सड़क पर प्रदर्शनों के भरोसे संभव नहीं है. उन्हें फिर से सत्ता की होड़ में आने के लिए सरकार के किसी बड़े वित्तीय घोटाला या व्यापक सामाजिक अशांति का इंतजार करना होगा.
