कोलकाता : पर्यावरण में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद (पीसीबी) ने विशेष प्रकार के रसायनिक पानी का प्रयोग करेेगी. प्रदूषण नियंत्रण पर्षद पानी में रसायन को मिला कर उसका छिड़काव करेगी, जिससे वायु में धूल-कण की मात्रा को कम किया जा सकेगा.
वायु प्रदूषण को कम करने के लिए शुरू किये जा रहे इस नयी पहल के बारे में पीसीबी के अधिकारी ने बताया कि एक कंपनी से उक्त रसायन के प्रयोग के संबंध में प्राथमिक रूप से चर्चा की गयी है. उक्त रसायन के छिड़काव से कोई नुकसान होगा या नहीं, पहले परीक्षा मूलक तरीके से इसका पानी में मिला कर प्रयोग किया जायेगा.
अगर इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता है तो इसे महानगर व आस-पास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए प्रयोग किया जायेगा. जानकारी के अनुसार, इससे पहले दिल्ली व महाराष्ट्र में उक्त रसायन को पानी में मिला कर छिड़काव किया गया था. वहां पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है, पीसीबी इस संबंध में जानकारियां एकत्रित कर रही है.
गौरतलब है कि कोलकाता सहित इसके आस-पास के क्षेत्रों में अक्तूबर के अंत से मार्च-अप्रैल तक वायु प्रदूषण बढ़ता ही जाता है. शीत काल में वायु में धूल-कण की मात्रा सबसे अधिक होती है. वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पीसीबी ने कई योजनाएं तैयार की हैं, लेकिन उसमें वाटर स्प्रिंकल के प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
पीसीबी के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यह प्रयोग सफल होने पर कोलकाता नगर निगम के साथ-साथ छह नगरपालिकाओं को वाटर स्प्रिंकल का प्रयोग करने की अनुमति दी जायेगी, जिनमें बैरकपुर नगरपालिका, हल्दिया नगरपालिका, बर्दवान नगरपालिका, दुर्गापुर नगरपालिका, आसनसोल नगर निगम व हावड़ा नगर निगम शामिल है. इसके अलावा बारुईपुर व दक्षिण दमदम नगरपालिका में भी वाटर स्प्रिंकल तकनीक का प्रयोग करने की योजना बनायी गयी है.
क्या है वाटर स्प्रिंकल तकनीक
वायु में धूल-कण की मात्रा को कम करने के लिए पानी में एक विशेष रसायन को मिला कर छिड़काव किया जाता है, जिससे अति सुक्ष्म धूल-कण आपस में जुट जाते हैं और फिर जमीन पर गिर जाते हैं. इससे वायु प्रदूषण की मात्रा कुछ हद तक कम हो जाती है.
स्थायी या दीर्घकालिक समाधान नहीं
इस संबंध में पर्यावरण विशेषज्ञ तन्मय रूद्र ने बताया कि वायु प्रदूषण की मात्रा को कम करने के लिए वाटर स्प्रिंकल का प्रयोग किया जा सकता है. लेकिन यह वायु प्रदूषण को कम करने का स्थायी या दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इस तकनीक का प्रयोग उस समय करना बेहतर होगा, जब वायु में धूल-कण की मात्रा अत्यधिक हो. ऐसी परिस्थिति में वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने में यह तकनीक काफी लाभप्रद साबित होगा.
