कोलकाता: दो दशक पहले कोलकाता की झुग्गी बस्ती में पली बढ़ी एक लड़की जो आज ब्रिटेन में कॉरपोरेट प्रशिक्षक है, उसने लंदन के अपने घर को छोड़ कर अपने क्षेत्र में लौट आने का फैसला किया है, ताकि वह दूसरे वंचितों की जिंदगी में सुधार ला सके.
जिलिया हसलम ब्रितानी माता-पिता की संतान है, जो 1947 के बाद भारत में ही रह गये थे. हसलम का पालन-पोषण बेहद गरीबी में महानगर के खिदिरपुर स्थित झुग्गी बस्ती में हुआ था, जहां से वह एक सफल बैंकिंग पेशेवर बन कर उभरीं. इसके बाद हसलम उत्साहवर्धक वक्ता व कॉरपोरेट प्रशिक्षक के रूप में लंदन चली गयी.
हसलम ने बताया कि अब मैं वास्तव में अपने शहर कोलकाता को कुछ लौटाना चाहती हूं. मैं यहां से दूर चली गयी थी, लेकिन मेरा दिल और आत्मा अभी भी यहीं बसता है और इसलिए अब मैं वंचितों, कैदियों, पूर्व-कैदियों और उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए ब्रिटेन में अपनाये जाने वाले कुछ व्यवहारों को यहां शुरू करूंगी.
शहर के दौरे के दौरान ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की बेटी हसलम ने पुरानी यादें ताजा कीं और अपनी बस्ती के मैत्रीभाव वाले उन पड़ोसियों से मुलाकात की, जिन्होंने मुश्किल के समय में उनके परिवार की मदद की थी. हसलम ने अपने कल्याणार्थ संगठन रेमेडिया ट्रस्ट फाउंडेशन के बैनर तले विभिन्न क्षेत्रों से स्वयंसेवियों के पांच दल बनाये हैं. यह स्वयंसेवी वंचितों के जीवन में सुधार लाने के अभियान पर काम करेंगे. उन्होंने महानगर के पास एक प्रशिक्षण केंद्र खोलने के लिए जमीन खरीदी है और नवंबर में शहर में लौटने का वादा किया है. 90 के दशक में एक किशोरी के रूप में शहर छोड़नेवाली 43 वर्षीया हसलम की बातचीत का भारतीय लहजा अभी भी वैसा ही है.
हसलम ने कहा कि मैं यहां अपना दल बना रही हूं, जो यहां से काम करेंगे और मैं नियमित रूप से कोलकाता आती रहूंगी. उनके दल ने यूनेस्को की रिपोर्ट पर आधारित ई 3 ( एजुकेट-एंपावर-एंप्लॉय) नामक एक ऐसा कार्यक्रम तैयार किया है, जो ब्रिटेन में हाशिये पर जी रहे समुदायों के लिए सफल साबित हुआ है. इस कार्यक्रम में वेटर, दर्जी, ब्यूटीशियन जैसे रोजगार योग्य कौशल और मूल शिक्षा देना शामिल है.
